Mahatma Gandhi- An Inspiration

Mahatma Gandhi- An Inspiration
Mahatma Gandhi- An Inspiration

महात्मा  गांधी (Mahatma Gandhi) एक ऐसा नाम है ही नहीं जिसे भारत ही नहीं कोई दुनिया में किसी भी परिचय की जरूरत नहीं है सत्य और अहिंसा के पुजारी इसमें बिना शस्त्र उठाए अंग्रेजों को झुका दिया और भारत को आजादी दिलाने में अहम किरदार निभाया।

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का जन्म 2 अक्टूबर को पोरबंदर काठियावाड़ एजेंसी, गुजरात में हुआ था। गाँधी जी का पूरा नाम मोहन दास करमचंद गाँधी था। गांधी जी के पिता का नाम करमचंद गांधी था जो कि राजकोट के दीवान थे और इनकी माता का नाम पुतलीबाई था । 30 जनवरी 1948 को गांधी जी को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

आज हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)  के जीवन से जुड़े चार सबसे प्रेरक प्रसंग को साझा करेंगे आइए जानते हैं –

1. पहला प्रेरक प्रसंग – अमूल्य दान

गांधीजी देशभर में भ्रमण कर चरखा संघ के लिए धन इकट्ठा कर रहे थे अपने दौरे के दौरान वह उड़ीसा में किसी सभा को संबोधित करने पहुंचे । उनके भाषण को खत्म होने के बाद एक गरीब महिला खड़ी हुई और गांधीजी के समीप आई । वह बहुत गरीब थी मैले फटे हुए कपड़े और कमर से झुक कर चल रही थी, किसी तरह वह भीड़ से होते हुए गांधी जी के पास पहुंची । वह आग्रह करने लगी कि उसे गांधीजी के पास पहुंचना है और उन्हें देखने की अभिलाषी है।

किसी भी तरह वह उनके पास पहुंची और पहुंचकर उनके पैर छुए उसने अपनी साड़ी के पल्लू से बंधे हुए एक तांबे के सिक्के को निकाला और गांधी जी के चरणों में रख दिया । गांधीजी ने सावधानी से उस सिक्के को उठाया और अपने पास रख लिया, उस समय चरखा संघ के कोष जमुनालाल वाला जी संभाल रहे थे, उन्होंने गांधीजी से वह सिक्का मांगा परंतु गांधी जी ने सिक्के को उन्हें देने से मना कर दिया । यह देखकर जमुनालाल जी अचंभित रह गए, अचंभे से भरे हुए जमुनालाल ने गांधी जी से कहा कि वे चरखा संघ के सारे कोष और चेक संभालता हु, परंतु आप इस ताम्बे के सिक्के को मुझे क्यों नहीं सौंप रहे? क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं??

गांधीजी ने मुस्कुराते हुए कहा यह तांबे का सिक्का उन हजारों से कहीं ज्यादा कीमती है, मूल्यवान है । गांधी जी ने कहा यदि किसी के पास लाखों है और वह 1000-2000 रुपये दे देता है तो उसे उस दान से कोई फर्क नहीं पड़ेगा ,परंतु यह सिक्का शायद उस गरीब महिला के पूरे जीवन की जमा पूंजी थी और उसने अपना पूरा संसार दान दे दिया है । कितनी उदारता दिखाई है उस महिला ने, कितना बड़ा बलिदान दिया है, इसलिए इस तांबे के सिक्के का मूल्य मेरे लिए एक करोड़ से भी अधिक है ।

2. दूसरा प्रसंग – डर का सामना

यह प्रसंग गांधीजी के बचपन से जुड़ी हुई है जिसने गांधी जी के पूरे जीवन को बदल दिया।

रात  बड़ी काली थी और मोहन बड़े डरे हुए थे। हमेशा से ही उन्हें भूतों से डर लगता था, वह जब भी अंधेरे में अकेले होते थे उन्हें लगता था कि कोई भूत उनके  आस-पास है, और कभी भी उन पर झपट पड़ेगा। वह रात इतनी काली थी की कुछ भी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहा था, ऐसे में मोहन को एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना था। वह हिम्मत करके कमरे से निकले और उनका दिल जोर जोर से धड़क रहा था और चेहरे पर डर का भाव था।

वही घर में काम करने वाली रंभा दरवाजे के पीछे खड़ी सब कुछ बड़े गौर से देख रही थी फिर उसने हंसते हुए पूछा-

क्या हुआ बेटा ?

मोहन ने उत्तर देते हुए कहा कि उन्हें डर लग रहा है

इस बात पर रंभा ने उन्हें पूछा डर ?? किस बात का डर??

मोहन ने सहमते हुए बोला देखिए कितना अंधेरा है, मुझे भूतों से डर लगता है।

रंभा ने प्यार से गांधी जी के सर को सहलाते हुए कहा –

“जो कोई भी अंधेरे से डरता है वह मेरी बात सुने, श्री राम जी के बारे में सोचो और कोई भी हो तुम्हारे पास आने की कभी हिम्मत नहीं करेगा, कोई तुम्हारा सर का बाल तक छू नहीं पाएगा। श्री राम जी हमेशा तुम्हारी रक्षा करेंगे।”

रंभा के इन शब्दों ने बालक मोहन को हिम्मत दी , राम नाम लेते हुए गांधी जी अपने कमरे से निकले और उस दिन के बाद मोहन कभी भी खुद को अकेला नहीं समझा और कभी भयभीत भी नहीं हुए। अब उनको विश्वास हो चुका था कि जब तक श्री राम उनके साथ है, उन्हें किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।

उनके इस विश्वास ने गाँधी जी को जीवन भर सकती दी और मरते वक्त भी उनके मुंह से राम नाम ही निकला।

3.तीसरा प्रसंग – संयम का महत्व

यह बात 1962 की है। गांधी जी (Mahatma Gandhi) दक्षिण भारत की यात्रा पर थे। उनके साथ अन्य सहयोगियों के अलावा काकासाहेब कालेलकर भी थे। वे सुदूर दक्षिण में नागर-कोइल पहुंचे। वहां से कन्याकुमारी काफ़ी पास है। इस दौरे के पहले के किसी दौरे में गांधी जी कन्याकुमारी हो आए थे। वहां के मनोरम दृष्य ने उन्हें काफ़ी प्रभावित किया था। गांधी जहां ठहरे थे, उस घर के गृह-स्वामी को बुलाकर उन्होंने कहा, “काका को मैं कन्याकुमारी भेजना चाहता हूं। उनके लिए मोटर का प्रबंध कर दीजिए।”

कुछ देर के बाद उन्होंने देखा कि काकासाहेब अभी तक घर में ही बैठे हैं, तो उन्होंने गृहस्वामी को बुलाया और पूछा, “काका के जाने का प्रबंध हुआ या नहीं?”

किसी को काम सौंपने के बाद उसके बारे में दर्याफ़्त करते रहना बापू की आदत में शुमार नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया। यह स्पष्ट कर रहा था कि कन्याकुमारी से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे। स्वामी विवेकानन्द भी वहां जाकर भावावेश में आ गए थे और समुद्र में कूद कर कुछ दूर के एक बड़े पत्थर तक तैरते गए थे।

काकासाहेब ने बापू से पूछा, “आप भी आएंगे न?”

बापू ने कहा, “बार-बार जाना मेरे नसीब में नहीं है। एक दफ़ा हो आया इतना ही काफ़ी है।”

इस जवाब से काकासाहेब को दु:ख हुआ। वे चाहते थे कि बापू भी साथ जाएं। बापू ने काकासाहेब को नाराज देख कर गंभीरता से कहा, “देखो, इतना बड़ा आंदोलन लिए बैठा हूं। हज़ारों स्वयंसेवक देश के कार्य में लगे हुए हैं। अगर मैं रमणीय दृश्य देखने का लोभ संवरण न कर सकूं, तो सबके सब स्वयंसेवक मेरा ही अनुकरण करने लगेंगे। अब हिसाब लगाओ कि इस तरह कितने लोगों की सेवा से देश वंचित होगा? मेरे लिए संयम रखना ही अच्छा है।”

4. चौथा प्रसंग – आशावादी महात्मा गाँधी

कोलकाता में हिंदू मुस्लिम दंगे भड़के हुए थे काफी प्रयासों के बाद भी लोग शांत नहीं हो रहे थे। दंगों की चपेट में कई लोग आ चुके थे, ऐसे में गांधीजी वहां पहुंचे और अपने एक मित्र के पास ठहरे। उनके पहुंचने के बाद दंगा कुछ शांत हुआ, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद फिर से आग भड़क उठी यह देख गांधी जी (Mahatma Gandhi) बड़े दुखी हुए और उन्होंने आमरण अनशन करने का निर्णय लिय लिया, और 31 अगस्त 1947 को अनशन पर बैठ गए।

उसी दौरान एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति उनके पास आया और बड़े ग्लानि के साथ बोला मैं तुम्हारी मृत्यु का पाप अपने सर नहीं लेना चाहता, लो रोटी खा लो और अचानक ही वह फूट-फूट कर रोने लगा और कहने लगा मैं मरूंगा तो तो नर्क जाऊंगा।

क्यों?? गांधीजी ने बड़ी विनम्रता से पूछा

व्यक्ति बोला –  क्योंकि मैंने एक 8 साल के मुस्लिम लड़के की जान ली है।

गांधीजी ने पूछा तुमने उसे क्यों मारा??

व्यक्ति बोला क्योंकि मुसलमानों ने मेरे मासूम बच्चे को जान से मार दिया उसने यह रोते हुए बोला।

गांधीजी ने कुछ देर सोचा और फिर बोले मेरे पास एक उपाय है !!!

व्यक्ति बड़े आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगा

गाँधी जी बोले –

ठीक उसी उम्र का एक लड़का खोजो जिसने दंगों में अपने मां-बाप को खोया है, और उसे अपने बच्चे की तरह पालो, परंतु एक चीज सुनिश्चित कर लो वहां एक मुस्लिम होना चाहिए और उसी तरह बड़ा किया जाना चाहिए और यह कहकर गांधीजी ने अपनी बात मुस्कुराते हुए खत्म की।

दोस्तों कुछ तो जवाब होते हैं और कुछ जवाब लाजवाब होते हैं, महात्मा गांधी उनका जीवन और उनका विचार भी कुछ इसी तरह ही है। वह कहने से ज्यादा करने में विश्वास करते थे, उन्होंने सत्य के साथ प्रयोग करते हुए खुद को संवारा। अँधेरे और भूतों से डरने वाला बालक मोहन, ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता को झकझोरने वाली एक ऐसी शक्ति बना जिसके आगे अंग्रेज लाचार दिखे।

हथियारों का सामना किया जा सकता है, हिंसा को खत्म किया जा सकता है लेकिन अहिंसा की ताकत का एहसास भगवान महावीर के बाद महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने ही दिलाया , वह मानते थे कि अंधेरे से लड़ने के बजाय रोशनी फैलानी चाहिए, अंधेरा खुद ही खत्म हो जाएगा।

दोस्तों ये थी महात्मा गाँधी के जीवन से जुडी कुछ प्रेरक प्रसंग। आशा करता हु आपको यह आर्टिकल पसंद आया होगा।

धन्यवाद !!!

https://inspiretome.com/bhagat-singh-an-inspirational-journey/

Bhagat Singh (भगत सिंह), Rajguru (राजगुरु ), Sukhdev (सुखदेव)

Saheed Bhagat Singh – An Inspirational Journey (”एक सच्चे सेनानी का सच्चा समर्पण।”)

एक सेनानी अपने पराक्रम को प्रदर्शित करने के लिए कभी भी अवसरों की तलाश नहीं करता है, यह उनमे जन्मजात होते है, ऐसा ही कुछ हमारे सेनानी में भी था। जिन्होंने  समर्पण की परिभाषा  ही बदल दी जब वो 23 साल की उम्र में हस्ते-हस्ते फांसी पर चढ़ गए। ऐसा सच्चा समर्पण शायद ही कभी इस तरह से इतिहास  में प्रदर्शित हुआ होगा। जो हमारे क्रांतिकारी नायक शहीद भगत सिंह (Saheed Bhagat singh) द्वारा 23 मार्च 1923 में  किया गया ।

आइये दोस्तों आज भगत सिंह  (Saheed Bhagat singh) के कुछ अनछुए पहलुओं को करीब से जानते है जो वजह बनी  उनके महान व्यक्तित्व की ।

बचपन।

एक बार कि बात है कि भगत सिंह (Bhagat Singh) के हाथ बचपन में खेलते-खेलते अपने चाचा की बंदूक हाथ लग गई, बस बचपने में कहें या उत्सुक्ता में उन्होंने अपने चाचा से पूछा कि आखिर इससे क्या होता है ? उनके चाचा जी ने बताया कि वे इससे
अंग्रेजी हुकूमत को दूर भगाएंगे । बस फिर क्या था वह छोटा सा बच्चा दौड़कर अपने खेत में चला गया और पीछे-पीछे दौड़ते हुए चाचा जी भी गए देखा कि बच्चा गढ्ढ़ा खोद रहा है
, खोदने के बाद बंदूक को गढ्ढे में डालने लगा, चाचा जी से रहा नहीं गया और पूछा कि ये क्या कर रहे हो ? बड़ा ही मासूम लेकिन दृढ़ निश्चय झलका जब उस बच्चे ने कहा कि वे बंदूक की फसल उगा रहा हैं ताकि अंग्रेजों को भगाने में क्रांतिकारियों के काम आ सके।

दोस्तों यही वो समय था, जिसने भारत के इतिहास में एक क्रांति का नया बीज बोया, जो आगे चल कर इतना विशाल वृक्ष बना जिसने ब्रिटिश हुकूमत के दांत खट्टे कर दिए और उनकी नींदे उदा दी।

क्रांतिकारी भगत सिंह (Saheed Bhagat singh) को पढ़ने का बहुत शौक़ था, बचपन में ही उन्होंने 50 किताबे पढ़ डाली I वे कम उम्र में लेनिन के नेतृत्व वाले समाजवाद और समाजवादी क्रांतियों की ओर आकर्षित हुए और उनके बारे में पढ़ना शुरू किया। भगत सिंह (Bhagat Singh) ने अपने गाँव के स्कूल में पाँचवीं कक्षा तक पढ़ाई की, जिसके बाद उनके पिता किशन सिंह ने उन्हें लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में दाखिला दिलाया।

उनके इन सभी गतिविधियों ने  ही उन्हें विचारो का पक्का बनाया जो आगे चल कर उन्हें  और भी मजबूत बनाया जो  हम आगे के आर्टिकल में पढ़ेंगे –

“जिंदा रहने की ख्वाहिश कुदरती तौर पर मुझमे भी होनी चाहिए, मैं इसको छिपाना नही चाहता| लेकिन मेरा जिंदा रहना एक शर्त पर है, कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जिंदा नही रहना चाहता |”

जीवन के चार प्रमुख स्तम्भ

साहस, स्वाभिमान, बहादुरी और त्याग यह चार स्तंभ है जो हमारे जीवन की हर कठिनाइयों को पार करने में मदद करती है| जिसे भगत सिंह ने कुछ अलग ही रूप में दर्शाया

साहस का उठान : भगत सिंह (Bhagat Singh) द्वारा

साहस शब्द जितना छोटा है, उतना ही करिश्माई भी है, साहस का रिश्ता न तो लंबीचौड़ी कदकाठी से है और न धनदौलत से, यह हम सभी के भीतर होता है बस आवश्यकता है उसे बाहर लाने की ।

कम उम्र में भगत सिंह (Saheed Bhagat singh) ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और असहयोग आंदोलन के पीछे के कारणों का भी समर्थन किया और खुले तौर पर अँग्रेजी हुकुमत को चुनौती दी थी जब अंग्रेजो द्वारा प्रकाशित पुस्तकों को भगत सिंह (Bhagat Singh) ने जला डाला था जिसमे वो गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे उनकी किशोरावस्था के दौरान दो घटनाओं ने उन्हें देशभक्ति के लिए और भी मज़बूत बना दिया जिसमे पहली घटना 1919 में जलियांवाला बाग और दूसरी घटना 1921 में ननकाना साहिब में निहत्थे अकाली प्रदर्शनकारियों की हत्या थी।

जलियांवाला बाग की दशा इतनी ख़ौफ़नाक थी की वहाँ उन्हें भारतीयों की चीख़ने की आवाज़ महसुस होने लगी जिसके बाद उन्होंने भारतीयों के ख़ून से सनी मिट्टी उठाई और एक शीशी में एकत्र की और घर ले आये उस दिन वो एकदम शांत रहे और अपने गुस्से को पालने लगे और हर दिन उस मिट्टी की पूजा करने लगे और शपथ ली की अंग्रेजों की शाही हुकुमत को जड़ से उखाड़ देंगे और देश को आज़ादी दिला कर रहेँगे ।

चौरी चौरा घटना के बाद गांधी जी ने ”असहयोग आंदोलन” को वापस लेने का फैसला किया गाँधी जी के इस फैसले से भगत सिंह (Bhagat Singh) नाखुश थे, भगत सिंह (Bhagat Singh) ने गांधी जी की अहिंसक कार्रवाई से खुद को अलग कर लिया और युवा क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए और इस प्रकार अंग्रेजो के खिलाफ हिंसक विद्रोह के सबसे प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में एक क्रन्तिकारी ने जन्म लिया जिसने ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिला दी ये वही समय था जब इस महान देश का क्रन्तिकारी दौर  बढ़ता चला गया भारत माँ की आज़ादी तक ।

ये साहस हे था जब अंग्रेज़ो ने लाठियों से मार-मार कर लाला लाजपत राय की हत्या कर दी, वो साइमन कमीशन का विरोध कर रहे थे, उनकी मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह (Bhagat Singh), राजगुरु, सुखदेव और अन्य क्रांतिकारियों ने उनकी मौत का बदला लेने का फैसला किया । इन जांबाज देशभक्तों ने लाला लाजपत राय की मौत के ठीक एक महीने बाद अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और 17 दिसम्बर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफसर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया ।

‘’महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फांसी की सजा सुनाई गई । ’’

‘’ साहसी लोग ही कठिन समय में निर्णय ले पाते क्यों की वे सक्षम होते है ऐसा करने में , जो की अन्य लोग नहीं ले पाते क्यूँकि वे उसके  परिणाम से डरते है, परिणाम किसी के बस में नहीं होता, इसलिए हमे कर्म करना चाहिए , परिणाम  चिंता नहीं करनी  चाहिए । ‘’

  1. स्वाभिमान : जिसने कभी झुकने नहीं दिया
  • भगत सिंह (Saheed Bhagat singh) चाहते तो माफ़ी माँग कर फाँसी से बच सकते थे लेकिन मातृभूमि के इस सच्चे सपूत को झुकना पसंद नहीं था लेकिन भगत सिंह (Bhagat Singh) का मानना था की ज़िन्दगी तो अपने दम पर जी जाती है, दुसरो के कंधों पर तो जनाजे उठा करते है
  • क्रांतिकारी भगत सिंह (Bhagat Singh) के विचार गाँधी जी से बिल्कुल अलग थे, भगत सिंह (Bhagat Singh) का कहना  था की अगर हमे आज़ाद होना है तो ईंट का जवाब पत्थर से देना होगा, वह  कहते थे की  शक्ति का दुरूपयोग हो तो वो हिंसा  बन जाती है और अगर शक्ति का प्रयोग किसी सही कार्य को करने के लिए हो तो वो न्याय का एक रूप बन जाता है उनके इसी स्वभाव ने उन्हें कभी झुकने नहीं दिया, अंग्रेजो के ज़ुल्म सहते रहे और मुस्कराते रहे।
  1. त्याग (बलिदान) क्यों ज़रूरी है : किसी लक्ष्य के लिए
Bhagat Singh (भगत सिंह), Rajguru (राजगुरु ), Sukhdev(सुखदेव)
Photograph of Bhagat Singh (भगत सिंह), Rajguru (राजगुरु ), Sukhdev(सुखदेव)

“लिख रहा हु मैं अंजाम, जिसका कल आगाज आएगा । मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लाएगा|”

त्याग (बलिदान) क्यों ज़रूरी है : किसी लक्ष्य के लिए

  • भगत सिंह (Bhagat Singh) के त्याग को किसी मापदंड पर मापा नहीं जा सकता वो इतना बड़ा त्याग था जिसे करने के लिए एक प्रचंड इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है जो भगत सिंह (Saheed Bhagat singh), राजगुरु और सुखदेव द्वारा हमने देखी है।
  • उन्होंने कम उम्र में ही अपने देश के लिए अपने प्राण व अपना परिवार व अपनी युवावस्था की खुशियाँ को न्योछावर कर दी ताकि आज हम लोग चैन से जी सके और आज़ाद हवा में साँस ले सके।
  • उनकी शादी के लिए उनका परिवार सोच ही रहा था की भगत सिंह (Saheed Bhagat singh) ने शादी के लिए मना कर दिया और कहा अगर आजादी से पहले मैं शादी करूँ तो मेरी दुल्हन मौत होगी ।”
  • उनकी इसी विचारधारा ने उन्हें आज भी इतने वर्षो पश्चात भी हमारे दिल और दिमाग में ज़िंदा रखा है और एक प्रेणना का स्त्रोत बने हुए है ठीक उसी प्रकार आप भी किसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते है तो आपको ऐसे त्याग और बलिदान की जरूरत है जो आपको आपके लक्ष्य के और भी करीब लेकर जाएगी ।

’क्या आप तैयार है त्याग और समर्पण के लिए अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए ?

  1. बहादुरी – भगत सिंह
Bhagat Singh inspiretome
Bhagat Singh (भगत सिंह)-एक सच्चे सेनानी का सच्चा समर्पण
  • भगत सिंह (Bhagat Singh) ने अंग्रेजों से कहा था कि “फांसी के बजाय उन्हें गोली मार देनी चाहिए” लेकिन अंग्रेजों ने इस पर विचार नहीं किया।
  • उन्होंने अपने अंतिम पत्र में इसका उल्लेख किया, भगत सिंह ने इस पत्र में लिखा, “चूंकि मुझे युद्ध के दौरान गिरफ्तार किया गया था इसलिए, मुझे फांसी की सजा नहीं दी जा सकती। मुझे तोप के मुंह में डाल दिया जाए।” यह उनकी बहादुरी और राष्ट्र के लिए भावना को दर्शाता है।
  • साथियों के साथ, भगत सिंह ने सेंट्रल असेंबली(दिल्ली) में बम फेंके, वे किसी को घायल नहीं करना चाहते। बम निम्न श्रेणी के विस्फोटक से बने थे ।
  • भगत सिंह ने जेल में 116 दिन का उपवास किया था, अंग्रेज़ो के यातनाए  सहते रहे, जल का एक बूँद भी उन्हें पीने को  नहीं मिला न अन्न का एक दाना उन्होंने ग्रहण किया, आश्चर्य की बात है कि इस दौरान वह अपना सारा काम नियमित रूप से करते थे, जैसे गाना, किताबें पढ़ना, हर दिन कोर्ट जाना आदि।
  • भगत सिंह ने एक शक्तिशाली नारा इंकलाब जिंदाबाद’ गढ़ा, जो भारत के सशस्त्र संघर्ष का नारा बन गया।

23 मार्च, 1931 को आधिकारिक समय से एक घंटे पहले उन्हें फांसी दे दी गई थी। कहा जाता है कि जब भगत सिंह को फांसी दी गई थी, तब वे मुस्कुरा रहे थे। वास्तव में, यह “ब्रिटिश साम्राज्यवाद को कम” करने के लिए निडरता के साथ किया गया था। कहा जाता है कि भगत सिंह की फांसी की निगरानी के लिए कोई भी मजिस्ट्रेट तैयार नहीं था। मूल मृत्यु वारंट की समय सीमा समाप्त होने के बाद, एक मानद न्यायाधीश ने निष्पादन आदेश पर हस्ताक्षर किए और उसका निरीक्षण किया।

जब उनकी मां जेल में उनसे मिलने आई थीं, तो भगत सिंह Saheed Bhagat singh जोर-जोर से हंस रहे थे। यह देखकर जेल अधिकारी हैरान रह गए कि यह व्यक्ति कैसा है जो मौत के इतने करीब होने के बावजूद खुलकर हंस रहा है

उनका कहना था की देश के जवान देश के लिए कुछ भी कर सकते है देश का हुलिया बदल सकते है और देश को आजाद भी करा सकते है|

भगत सिंह के इस विचार और सोच को हमे आगे लेकर बढ़ना है, इस दुनिया को युवाओ की जरूरत है एक सतर्क और सक्रिय युवा कुछ भी कर सकने की हिम्मत रखता हो निडरता से भरा हुआ युवा जिसके लिए कुछ भी नामुमकिन ना हो।

पहचानो खुद को अपने अंदर की कला को अपने जूनून को ।

मेहनत और कड़ी तपस्या से पायी हुई मंज़िल एक गहरे सुख का अनुभव कराती है, ऐसे मनुष्य दैवीय होते है जो अपने प्रकाश मई आभा से इस संसार को जगमगाये रखते है, और लोगो को सही राह दिखाते है ।

उठो जागो और आगे बढ़ो ।

भगत सिंह सिर्फ़ नाम नहीं एक विचार है एक राह है एक सफर है , जो  बताता है ज़िन्दगी में कैसे-कैसे मोड़ और पड़ाव आते है जो निर्धारित करते है, की हम कहा जायँगे यह आप पर निर्भर करता है की आप उसे कैसे जीवन में अपनाते है, जीवन की विषम परिस्थितियों में जो मजबूती से खड़ा रहता है वही घोर अँधेरे में आशा की किरण लाता  है ।

माना की विषम परिस्थितियों में चट्टान की तरह खड़ा रहना आसान नहीं परन्तु नामुमकिन भी नहीं, समझा जाये तो नामुमकिन जैसी कोई चीज़ ही नहीं है, अगर कुछ करने की ठान ली जाये तो कुछ भी मुश्किल या नामुमकिन नहीं है, मनुष्य को उसकी इच्छा शक्ति ही उसे महान बनाती है और प्रेरित करती है उसे कुछ कर गुजरने की ।

उम्मीद है आपको ये आर्टिकल पसंद आया होगा आशा करता हूँ। इसे पढ़ने के बाद आप भी जीवन में एक सकारात्मक परिवर्तन अपनाये और खुद के साथ-साथ दुसरो के जीवन में भी एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे व उन्हें प्रेरित करे ।

धन्यवाद ।

”जय हिन्द”

(Inspiretome.com)

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