maharana pratap history

Maharana Pratap -Inspirational Warrior

Maharana Pratap

धन्य है इस देश की माटी जिसने जन्मा महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) जैसे शूरवीर को –

राणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को  कुंभलगढ़ में हुआ उनके  पिता राणा उदय सिंह और माता रानी जयवंती बाई थे,  यही वह महान माता थी जिन्होंने प्रताप को जन्मा और वह केवल माता ही नहीं थी, वे प्रताप की गुरु भी बनीं,  बचपन से प्रताप नेतृत्व (leadership) में महारथ थे,  वो कहते हैं ना पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं ठीक उसी प्रकार प्रताप बचपन से ही लीडरशिप में महारत थे,  बाल्यकाल में ही खेल खेल में मैं अपने दोस्तों को एक घूंट में बांट दिया करते थे और इनकी अवलोकन कौशल ( Observation skills) इतनी कमाल की थी कि उन्हें पता रहता था कि किस-किस में क्या-क्या गुण है और उसी के आधार पर वे अपने दोस्तों को उनका कार्य निर्धारित किया करते थे कि कौन क्या करेगा |

बचपन में ही उन्होंने पूरे अस्त्र शस्त्र चलाने सीख,  सभी सैन्य शिक्षा प्राप्त किया, उनके परिवार में और भी कई लोग थे जिनकी महानता एक से बढ़कर एक थी जैसे राणा सांगा,  बप्पा रावल,  राणा हमीर और राणा प्रताप,  परंतु यह केवल एक लौते  ही थे जिन्हें महा राणा प्रताप का दर्जा दिया गया |

महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) का प्रथम राज्य अभिषेक 28 फरवरी 1572 में गोगुंदा में हुआ, लेकिन विधि विधान स्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्य अभिषेक 1572 ईस्वी में ही कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ तथा वे मेवाड़ के तेरे तेरहवें राजा बने |

महाराणा प्रताप की बहुत ही अविश्वसनीय कद काठी हुआ करती थी वह 7.5 फीट के थे और युद्ध में जाने के दौरान वह 80 किलो का कवच 10-10 किलो के जूते, 10-10 किलो के तलवार तथा 80 किलो का भाला उठाकर युद्ध करते थे|

प्रताप एक महान व्यक्ता भी थे वे अपने सैनिकों को कुछ इस तरह उत्साहित कर देते थे कि वे प्रताप के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे, किसी भी युद्ध में लड़ने के लिए वह खुद को बहुत ही गौरवशाली माना करते थे |

साथी तेरा घोड़ा चेतक जिसपे तु सवारी करता था, थी तुझमें ऐसी खास बात जो अकबर भी तुझ से डरता था

मेवाड़ी राजा राजस्थान के सबसे शक्तिशाली और महान राजा हुआ करते थे जिन्होंने कभी अकबर को कभी जितने नहीं दिया, यह वही अकबर था जो पूरी भारत को जीत चुका था वह,अकबर कभी हरा नहीं पाया प्रताप को, और ना ही कभी उनका सामना करा किसी भी युद्ध में, अकबर ने कई बार इनसे संधि करने की कोशिश की, कई बार प्रलोभन देकर अपने राजदूतों को भेजा ताकि में अकबर की अधीनता स्वीकार कर ले, एक बार तो अकबर ने उन्हें आधा देश देने को तैयार हो गए थे और बदले में वह मेवाड़ अपने नाम करवाना चाहते थे |

हल्दीघाटी का युद्ध इसलिए हुआ क्योंकि प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया था, जबकि उस समय राजस्थान के लगभग सारे राजाओं ने अकबर के आगे समर्पण कर दिया था | हल्दीघाटी का युद्ध केवल 1 दिन में ही समाप्त हो,  गया जब 21 जून 1576 प्रताप और अकबर की सेना आमने-सामने हुई थी, प्रताप की सेना में राम सिंह तंवर, कृष्णदास ,रामदास राठौर, झाला आदि जैसे योद्धा थे |

प्रताप (Maharana Pratap) की सेना की अगुवाई अफगानी राजा हकीम सूर ने की जिसके परिवार से अकबर का पुराना बैर था, प्रताप की सेना की ओर से आदिवासियों की तरफ से 400-500 भील भी शामिल थे ,जिसका नेतृत्व भील राजा राम कुंजा कर रहे थे, भील शुरुआती से ही राजपूतों के स्वामी भक्त रहे हैं, राजस्थान का इतिहास लिखने वाले जेम्स टॉड के अनुसार हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप की सेना में 20000 से लेकर 22000 सैनिक थे जबकि अकबर की सेना में 80000 से 100000 तक सैनिक थे |

दूसरी तरफ अकबर की सेना का नेतृत्व करने के लिए  खुद अकबर ना आकर आमेर के राजा मानसिंह को सेनापति बनाकर प्रताप से लड़ने के लिए भेजा उनके साथ बहलोल खान, सैयद अहमद खान, मुल्तान खान ,गाजी खान ,वसीम खान जैसे योद्धा थे |

प्रताप ने अपनी सेना को चार भागों में बांट दिया था सबसे आगे हकीम खान और सबसे पीछे राव पूंजा,, बाई तरफ झाला मानसिंह दाएं तरफ राम सिंह तंवर थे जबकि प्रताप अपने मंत्री भामाशाह के साथ युद्ध भूमि के बीच में तैनात थे, 1576 में अकबर ने मानसिंह और आसिफ खान को प्रताप की सेना से मुकाबला करने के लिए भेजा जो खमनोर आकर रुकी थी दूसरी तरफ प्रताप की सेना हल्दीघाटी आकर रुकी थी, प्रताप के लिए सबसे दुख की बात यह थी कि उनका सगा भाई शक्ति सिंह मुगलों के साथ था और अकबर को इस  पहाड़ी इलाके में युद्ध करने की रणनीति बनाने में सहायता कर रहा था ताकि युद्ध में कम से कम मुगलों के सैनिक मरे |

21 जून 1576 को दोनों सेनाएं आगे बढ़ी और लख्त लाई पर दोनों सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ जो केवल 4 घंटे में ही खत्म हुआ ,पहाड़ी इलाके में युद्ध होने के कारण इसका फायदा प्रताप ने उठाया क्योंकि वह बचपन से ही इन इलाकों से भलीभांति परिचित थे,  इस युद्ध को  इतिहास में अनिर्णायक घोषित किया गया जबकि प्रताप की सेना ने अकबर की सेना के छक्के छुड़ा दिए थे |

हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप की सेना में हकीम खान सूर, डोडिया भीम, मान सिंह, झाला ,राम सिंह तंवर और उनके पुत्रों सहित अनेकों राजपूत शहीद हुए, हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने अकबर के सबसे बड़े सेनापति को बहलोल खान को तलवार के एक  ही काट से घोड़े समेत चीर डाला था |

अकबर की सेना में मानसिंह के अलावा सभी बड़े योद्धा मारे गए, युद्ध में जब राणा प्रताप मानसिंह के करीब पहुंच गए थे और अपने घोड़े चेतक को मानसिंह के हाथी का चढ़ाया और भाले से मानसिंह को मारने के लिए वार किया मानसिंह तो बच गया परंतु उनका महावत मारा गया, चेतक जब हाथी से उतरा तब हाथी की सूंड में लगे तलवार से उसका एक पैर कट गया |

जितने महान महाराणा प्रताप थे उतना ही महान उनका घोड़ा चेतक था,

राणा प्रताप युद्ध में अलग-थलग पड़ गए थे उनकी जान बचाने के लिए चेतक  प्रताप को लेकर भागा ,3 किलोमीटर दौड़ने के बाद अचानक सामने एक 28 फीट चौड़ा नाला आया, जिसे चेतक ने बड़े बहादुरी के साथ एक छलांग में टाप गया , चेतक ने अपना कर्तव्य निभाते हुए अपनी राजा महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की जान बचाई और उस लंबी छलांग के कारण उसे अपने प्राण त्याग ने पड़े |

Maharana Pratap-the great warrior

उस समय उनके भाई शक्ति सिंह उनके पीछे थे, शक्ति सिंह को उनके भूल का एहसास हुआ और उन्होंने अपने भाई की मदद की, दूसरी तरफ प्रताप के रण से चले जाने के बाद उनके स्थान पर उनके हमशक्ल झाला मानसिंह ने उनका मुकुट पहनकर मुगलों को भ्रमित किया, उनको प्रताप समझकर मुगल उन पर टूट पड़े और इसमें झाला मानसिंह शहीद हो गए |

महाराणा प्रताप के पास चेतक ही नहीं था, उनके पास रामप्रसाद नाम का एक हाथी भी था

रामप्रसाद की हर युद्ध में अहम भूमिका हुआ करती थी, हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर के 10 हाथी मार दिए और कई घोड़े मार दिए इनके आगे सूंढ़ पे एक घातक तलवार लगी थी जिसके कारण कोई भी हाथी अन्य पशुओं के सामने टिक नहीं पाता था, राम प्रसाद को पकड़ने के लिए अकबर ने 10 हाथियों का चक्रव्यूह रचा और उन्हें जैसे तैसे करके बंधी बना लिया |

 रामप्रसाद एक हाथी था जिसने अपने राजा महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) के वियोग में अन्न और जल ग्रहण  करना करना छोड़ दिया, अकबर ने बहुत प्रयास किए ,परन्तु उसने कुछ नहीं खाया, और   कमजोर होने के कारण और अंत  में उसने शरीर को त्याग दिया |

यह देखकर अकबर बोला जिस राणा प्रताप के हाथी ने उसके सामने सर नहीं झुकाया, वो राणा प्रताप का सर कैसे झुका सकते थे,  बाद में अकबर ने हाथी रामप्रसाद का नाम रखा पीर रखा |

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप का दिल पसीज गया और उन्होंने प्रण लिया मुगलों से जीतने तक राजकीय ठाट पाट जाकर जंगल में निवास करेंगे और वहां उन्होंने घास की रोटियां खाई, कंदमूल, उबले हुए भोजन खाए, पत्थरों की सैया बनाकर उस पर सोए, मेवाड़ तब तक सुरक्षित था जब तक महाराणा प्रताप जीवित थे , अकबर की कभी हिम्मत ना हुई कि इनका युद्ध में सामना कर सकें, उसे पता था और कभी सामने से इनसे नहीं जी सकता था क्योंकि वह जानता था कि राणा प्रताप में एक ही तलवार के वार से उसके सेनापति बहलोल खान को घोड़े समेत काट डाला था |

महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) एक ऐसे राजा थे जो कभी व्यर्थ के कामों में अपना समय नहीं गंवाया करते थे,  वे अपना कीमती समय अपने सेना के साथ व्यतीत करते थे उन्हें हमेशा प्रोत्साहित और पहले से बेहतर बनाया करते थे, नए-नए युद्ध नीतियां बनाया करते थे उनके रहन-सहन को अपनाते थे, वह प्रताप के लिए कुछ भी करने को तैयार थे यही कारण था कि अकबर विशाल सेना होने के बाद भी महाराणा प्रताप के सामने घुटने टेक दिए थे |

महाराणा प्रताप ने अपने सैन्य बल को बढ़ाकर कुंभलगढ़ पर पुनः विजय प्राप्त किए, सिर्फ चित्तौड़गढ़ को छोड़कर सारे मेवार को अपने अधीन कर लिया उसके बाद चावंड में उन्होंने अपनी राजधानी स्थापित की हल्दीघाटी का युद्ध इतना भयंकर था कि आज भी उस हल्दी वाली मिट्टी से खून निकलता है और आज भी तलवारों के जत्थे मिट्टी मिट्टी के नीचे से निकलते हैं युद्ध के बाद भी वहां के सिक्के नहीं बदले प्रताप के नाम से ही चलते थे अकबर के नहीं, अकबर उनके नाम से ही डरता था सोने से पहले उनके बारे में सोचने से भी डरता था |

19 जनवरी 1597 को केवल 57 वर्ष की आयु में ही प्रताप में अपने प्राण त्यागे |

हल्दीघाटी का युद्ध एक आत्मसम्मान, मातृभूमि की रक्षा और स्वाधीनता का संघर्ष था |

वीर महाराणा प्रताप (Maharana Pratap)

स्वतंत्रता की वेदी पर ऐसा अंगारा था जो आत्मसम्मान और देश, दोनों के लिए दिन-रात जलता था, दिन-रात धधकता रहता था और अंत में बुझ कर भी उसने देश के लोगो में लो भर दिया,

जिसकी प्रखर किरणों ने भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने के लिए सदा प्रेरित किया |

जय हिन्द !!!

जय भारती !!!

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