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The struggle of Abdul Kalam

अब्दुल कलाम का पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुल आब्दीन अब्दुल कलाम मसऊदी था । उनका जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम तमिलनाडु में हुआ था, कलाम एक मध्यमवर्गीय घर में जन्मे थे जिनके कई सारे भाई-बहन थे उनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन और माता का नाम आशियम्मा था, वे अपने पुश्तैनी घर में रहा करते थे जो उनके पूर्वजो ने उन्नीसवीं सदी में बनाया था ।

Abdul Kalam’s full name was Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam Masoudi. He was born on 15 October 1931 in Rameswaram, Tamil Nadu. Kalam was born in a middle-class household with many siblings. His father’s name was Jainulabdeen and mother’s name was Ashiamma, lived in his ancestral house which his ancestors had built in the nineteenth century.

हर बच्चे को अपने जीवन की प्रारंभिक शिक्षा उसके माता-पिता से मिलती हैं और कलाम को भी अपने पिता से आत्म-अनुशासन और माता से रहम-दिली व अच्छाई पर विश्वास करना विरासत में मिला था । बाकी भाई-बहनों की तुलना में कलाम बचपन से ही शांत रहा करते थे और अकेले मे समय बिताना पसंद करते थे । अक्सर कलाम समुद्र किनारे बैठकर पक्षियों को उड़ते देखा करते थे और पक्षियों को उड़ता देख उनके मन में भी उड़ने की इच्छा पैदा होने लगी अब कलाम को भी तारों के पास जाना था और उड़ना था ।

Every child gets his early education in his life from his parents, and Kalam inherited self-discipline from his father and faith in good-heartedness and goodness from his mother. Compared to the rest of the siblings, Kalam remained calm from childhood and preferred to spend time alone. Often, Kalam used to see birds flying on the seashore and seeing the birds flying, he started to have a desire to fly too. Now Kalam had to go to the stars and fly.

जलालुद्दीन और शमशुद्दीन से प्रभावित और प्रेरित। (Influenced and inspire from Jalaluddin and Shamshuddin).

उस समय उनकी मुलाकात अहमद जलालुद्दीन से हुई, जलालुद्दीन कलाम के पिता जैनुलाब्दीन के रिश्तेदार थे जिनका विवाह बाद में कलाम की बहन ज़ोहरा के साथ हुआ । अहमद जलालुद्दीन घर के कमज़ोर हालातों की वजह से पढाई पूरी नहीं कर सके थे । परंतु जलालुद्दीन हमेशा पढ़े-लिखे लोगो की बातें किया  करते थे और उस समय रामेश्वर में एक वही व्यक्ति थे जिन्हें अंग्रेजी लिखनी आती थी । जलालुद्दीन हमेशा कहा करते थे कि तुम्हें कड़ी मेहनत से पढ़ाई करनी चाहिए उसके बाद स्कूल और फिर कॉलेज । जलालुद्दीन हो वो पहले शख्स थे जिन्होंने कलाम को रामेश्वरम के जीवन से अलग सोचने के लिए प्रेरित किया था वैसे तो जलालुद्दीन कलाम से 15 वर्ष  बढे थे पर फिर भी कलाम के बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे ।

He met Ahmed Jalaluddin, a relative of Jalaluddin Kalam’s father Jainulabdeen, who was later married to Kalam’s sister Zohra. Ahmad Jalaluddin could not complete his studies due to poor conditions in the house. But Jalaluddin always used to talk to educated people and at that time there was a person in Rameswaram who used to write English. Jalaluddin always used to say that you should study hard, then school and then college. Jalaluddin was the first person who inspired Kalam to think differently from Rameswaram’s life, although Jalaluddin was 15 years older than Kalam but still became very good friend of Kalam.

एक व्यक्ति और भी था जिन्होंने कलाम को काफी प्रभावित किया था और वह उनके चचेरे भाई शमशुद्दीन थे । शमशुद्दीन के पास पूरे रामेश्वरम के अखबारों का ठेका था और वह अकेले ही इस काम को किया करते थे । उन दिनों अखबारों का गट्ठा ट्रेन से रामेश्वरम स्टेशन पर पहुंचाया जाता था और शमशुद्दीन उन अखबारों को पूरे रामेश्वर में पहुंचाया करते थे ।

There was another person who greatly influenced Kalam and it was his cousin Shamshuddin. Shamshuddin had contracts for newspapers across Rameswaram and used to do this work alone. In those days, the bundle of newspapers was transported by train to Rameswaram station and Shamshuddin used to carry those newspapers all over Rameswaram.

वर्ष 1939 दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब रोजमर्रा की वस्तुओं की कमी होने लगी तब कलाम को लगा कि उन्हें भी कोई काम करना चाहिए जिससे वह पैसा कमा सके और घर की मदद हो सके । दूसरे विश्व युद्ध के चलते रामेश्वरम स्टेशन पर ट्रेन का रुकना बंद कर दिया गया और जो अख़बारों का गट्ठा रामेश्वरम स्टेशन पर छोड़ा जाता था अब वह अख़बारों का गट्ठा रामेश्वरम स्टेशन और धनुषकोडी स्टेशन के बीच रोड पर चलती ट्रेन से फेंक दिया जाता था, शमशुद्दीन की परेशानी बढ़ गई थी और उसे इस काम के लिए एक व्यक्ति की जरूरत थी जिसका मौका कलाम को मिला।

During the second world war in 1939, when the scarcity of everyday items started, Kalam felt that he too should do some work so that he could earn money and help the house. Due to the second world war, the train stopped at Rameswaram station and the newspaper bundle which was left at Rameswaram station was now thrown from the moving train on the road between the newspaper Rameswaram station and Dhanushkodi station, Shamshuddin’s troubles had increased and he needed a person for this work, whose opportunity was given to Kalam.

जंग खत्म होने के बाद कलाम जलालुद्दीन और शमशुद्दीन के साथ श्वार्ट्ज हाई स्कूल (Schwartz High School) में एडमिशन लेने के लिए रामनाथपुरम शहर चले गए । श्वार्ट्ज हाई स्कूल में कलाम और सर इयादुरै सोलोमन का रिश्ता गुरु-शिष्य की तरह जुड़ गया जिसके बाद कलाम का भीतर पढ़ने की इच्छा और भी बढ़ गई थी ।

After the war ended, Kalam along with Jalaluddin and Shamshuddin moved to the city of Ramanathapuram to take admission in Schwartz High School. At Schwartz High School, Kalam and Sir Iayadurai Solomon’s relationship became more like a guru-disciple, after which Kalam’s desire to study further grew.

श्वार्ट्ज हाई स्कूल (Schwartz High  School) से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कलाम ने तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज (St. Joseph Collage) में बीएससी (B.Sc.) के फिजिक्स (Physics) में प्रवेश करने का निर्णय लिया । कॉलेज के दिनों में शिक्षक महान लोगों के बारे में बताया करते थे और नैतिक पाठ पढ़ाया करते थे जिससे बच्चे सही और गलत को समझ सके और अपने जीवन में खुद निर्णय ले सके ।

After completing his studies from Schwartz High School, Kalam decided to enter (B.Sc.) Physics at St. Joseph’s Collage in Tiruchirappalli. In college days, teachers used to talk about great people and taught moral lessons so that children can understand right and wrong and take decisions in their own life.

बीएससी (B.Sc.) पास करने के बाद कलाम को पता लगा कि फिजिक्स (Physics)उनका विषय नहीं है और उन्हें इंजीनियरिंग (Engineering) में जाना चाहिए, जहां वह अपने बचपन का सपना पूरा  कर सके जो वो हमेशा देखा करते थे , उड़ने का सपना तारों के पास पहुंचने का सपना । कलाम के अंदर अब एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग (Aeronautical Engineering) करने की चाहत बढ़ने लगी । उस समय इस कोर्स के लिए सबसे सर्वश्रेष्ठ संस्थान एमआईटी (MIT) (मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) (Madras institute of Technology) हुआ करता था । एमआईटी (MIT) कॉलेज में सीट मिलना उस समय बहुत कठिन होता था जिसके बावजूद कलाम को एमआईटी (MIT) का प्रवेश पत्र मिला और घर में खुशियों की लहर दौड़ गई ।

After passing his B.Sc. Kalam finds out that physics is not his subject and should go to engineering where he can fulfill his childhood dream which he always saw, dream of flying to reach the stars. The desire to do Aeronautical Engineering started growing inside Kalam. At that time the best institute for this course was MIT (Madras Institute of Technology). It was very difficult to get a seat in MIT College, despite which Kalam got MIT’s admit card and there was a wave of happiness in the house.

एमआईटी (MIT) का दाखिला महँगा था और कम-से-कम एक हजार रुपए की जरूरत थी और कलाम के पिता जैनुलाब्दीन के पास इतने रुपए नहीं थे तब उनकी बहन है ज़ोहरा ने अपने सोने के कड़े और चैन बेच कर कलाम की फीस का इंतजाम किया था । कलाम पढ़ने के इच्छुक थे और उन्होंने प्रण लिया कि जैसी ही वे पैसे कमाएंगे सबसे पहले ज़ोहरा के जेवर उन्हें वापस करेंगे ।एमआईटी (MIT) का पहला साल पास करने के बाद अब स्पेशल ब्रांच के विषय का चुनाव करना था और कलाम ने बिना किसी देरी के एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग (Aeronautical Engineering) का चुनाव कर लिया ।

MIT’s admission was expensive and required at least a thousand rupees and Kalam’s father Jainulabdeen did not have that much money, then his sister Zohra sold his gold stringent and Jain chain to Kalam’s fees. Had arranged Kalam was keen to study and vowed that as soon as he would earn money, he would first return the jewels to Zohra. After passing the first year of MIT, the subject of Special Branch was to be selected and Kalam chose Aeronautical Engineering without any delay.

अपने कोर्स के तीसरे वर्ष में कलाम को 6 विद्यार्थियों के समूह के साथ एक निम्न स्तर के हमले के विमान को डिजाइन करने के लिए प्रोजेक्ट दिया गया । अपने प्रोफेसर के दिए गए इतने कम समय में इतना कठिन प्रोजेक्ट पूरा कर पाना असंभव सा था परंतु कलाम ने सभी विद्यार्थियों के साथ मिलकर उस प्रोजेक्ट में खुद को झोंक दिया और प्रोजेक्ट समय सीमा के अंतर्गत पूरा किया । जिसके बाद प्रोफेसर श्रीनिवासन द्वारा कलाम सरहा गया । इस घटना से कलाम ने एक बात सीखी थी कि कभी भी मेहनत की ताकत को कम नहीं समझना चाहिए फिर चाहे कार्य असंभव ही क्यों ना हो ।

In the third year of his course, Kalam was given a project to design a low-level attack aircraft with a group of 6 students. It was impossible to complete such a difficult project in such a short time given by his professor but Kalam along with all the students pushed themselves into that project and completed the project within the time limit. After which Kalam was appreciated by Professor Srinivasan. Kalam had learned one thing from this incident that one should never underestimate the power of hard work, even if the task is impossible.

एमआईटी (MIT) से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब वक्त था इंटर्नशिप करने का जिससे उन्हें एयरक्राफ्ट (Aircraft) पर अच्छे से काम करने का मौका मिलता । इंटर्नशिप के लिए कलाम ने बेंगलुरु के (HAL) हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (Hindustan Aeronautical Limited) को चुना ।

After completing his engineering studies from MIT, now was the time to do an internship which would give him an opportunity to work well on the aircraft. For the internship, Kalam chose Hindustan Aeronautical Limited (HAL) in Bangalore.

(HAL) से अपनी इंटर्नशिप पूरी करने के बाद कलाम ने नौकरी के लिए प्रार्थना-पत्र (Apply) दिया और अपने जीवन के पहले इंटरव्यू के लिए उत्तर भारत की तरफ दिल्ली रवाना हुए । पहला इंटरव्यू दिल्ली में (DTD&P) (डायरेक्टरेट ऑफ टेक्निकल डेवलपमेंट एंड प्रोडक्शन Directorate of Technical Development and production) में था और दूसरा देहरादून में इंडियन एयर फोर्स (Indian Air Force) के साथ।

After completing his internship from (HAL), Kalam applied for the job (application) after which Kalam left for North India towards Delhi for the first interview of his life. The first interview was in Delhi (DTD & P) (Directorate of Technical Development and Production Directorate of Technical Development and Production) and the second with the Indian Air Force (IAF) in Dehradun.

दिल्ली में इंटरव्यू देने के तुरंत बाद कलाम देहरादून के लिए रवाना हो गए । एयर फोर्स को शानदार इंटरव्यू देने के बाद 25 लोगो में से 8 को चुन लिया गया और कलाम का नाम उस लिस्ट में नौवें नंबर पर था । कलाम का दिल बैठ गया अब कलाम बहुत ज़्यादा निराश हो गये और सोचने लगे की एयर फ़ोर्से में जाने का उनके बचपन का सपना अधूरा रह गया। दुखी भाव के साथ कलाम ऋषिकेश गंगा नदी में डुबकी मारने के लिए निकल गए और पास की पहाड़ी पर स्वामी शिवानन्द के आश्रम पहुँचे ।

Kalam left for Dehradun soon after giving interviews in Delhi. After giving an excellent interview to the Air Force, 8 out of 25 people were selected and Kalam’s name was at number nine in that list. Kalam’s heart sat down, now Kalam became very frustrated and started thinking that his childhood dream of going to the Air Force remained incomplete. With unhappiness, Kalam set out to take a dip in the Ganges river in Rishikesh and reached the ashram of Swami Shivananda on a nearby hill.

आश्रम पहुँचने के बाद उनकी मुलाकत स्वामी शिवानन्द से हुई और कलाम ने उन्हें दुखी मन के साथ अपने एयर फ़ोर्से के इंटरव्यू के बारे में बताया। स्वामी जी ने कहा कि हमारे जीवन में जो कुछ भी होता है वह पूर्व निर्धारित होता है और आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यही है कि जो हुआ है उसे स्वीकार करें और आगे बढ़ें। स्वामी जी के शांत स्वभाव और शांतिदायक वचनो ने कलाम के मन्न में एक बार फिर आशा की किरण और साहस उत्पन्न कर दिया।

After reaching the ashram, he met Swami Shivanand and told him about his Air Force interview with a sad feeling. Swami Ji said that everything that happens in our life is predetermined and the only way to move forward is to accept what has happened and move forward. Swami Ji’s calm nature and peaceful words once again created a ray of hope and courage in Kalam’s mind and returned to Delhi with a renewed vigor.

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