श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है। ”महाभारत” के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में भगवान ”श्री कृष्ण” ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह ”महाभारत” के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है। ”भगवत गीता” (Shrimad Bhagwat Geeta) में एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा हुई है।

 

 

”श्रीमद्भगवद्गीता” (Shrimad Bhagwat Geeta) वर्तमान में धर्म से ज्यादा जीवन के प्रति अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को लेकर ”भारत” में ही नहीं विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रही है। निष्काम कर्म का गीता का संदेश प्रबंधन गुरुओं को भी लुभा रहा है। विश्व के सभी धर्मों की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों में शामिल है।

 

प्रथम अध्याय

 

 

धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

॥1॥

Dhrutarastra said : O Sanjay, after assembling in the place of pilgrimage at Kuruksetra, what did my sons and sons of Pandu do, being desirous to fight?

 

 

 

संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा ।

॥2॥

Sanjaya said : O King, after looking over the army gathered by the sons of Pandu, King Duryodhana went to his teacher and began to speak the following words.- Shrimad Bhagwat Geeta

 

 

 

हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए ।

॥3॥

O my teacher, behold the great army of the sons of Pandu, so expertly arranged by your intelligent disciple, the son of Drupada.

 

 

 

इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर, युयुधाना, विरता और द्रुपद जैसे महान सेनानी भी हैं।

॥4॥

Here in this army there are many heroic bowmen equal in fighting to Bhima and Arjuna; there are also great fighters like Yuyudhana, Virata and Drupada.- Shrimad Bhagwat Geeta

 

 

धृष्टकेतु, सेकेतना, कासिराजा, पुरुजीत, कुन्तिभोज और साईब्या जैसे महान, वीर, शक्तिशाली सेनानी भी हैं।

॥5॥

There are also great, heroic, powerful fighters like Dhrstaketu, Cekitana, Kasiraja, Purujit, Kuntibhoja and Saibya.

 

सुधद्र के पुत्र और द्रौपदी के पुत्र, शक्तिशाली उत्तमौज, युधामन्यु हैं। ये सभी योद्धा महान सेनानी हैं।

॥6॥

There are highly Yudhamanyu, the powerful Uttamauja, the son of Subhadra and the sons of Draupadi. All these warriors are great chariot fighters.

 

 

 

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ ।

॥7॥

O best of the brahmanas, for your information, let me tell you about the captains who are easpecially qualified to lead my military force.

 

 

 

आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा ।

॥8॥

There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Krupaacharya, Aswatthama, Vikarna, and the son of Somadatta called Bhurisrava, and who are always victorious in battle.

 

 

 

और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं ।

॥9॥

There are many other heroes who are prepared to lay down their lives for my sake. All of them are well equipped with different kinds of weapons, and all are experienced in military science.

 

 

 

भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है ।

॥10॥

Our strength is immeasurable, and we are perfectly protected by Grandfather Bhisma, whereas the strength of the Pandavas, carefully protected by Bhima, is limited.

 

 

 

इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें ।

॥11॥

Now all of you must give full support to Grandfather Bhisma, standing at your respective strategic points in the phalanx of the army.

 

 

कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया ।

॥12॥

Then Bhisma, the great valiant grandsire of the Kuru dynasty, the grandfather of the fighters, blew his conch shell very loudly like the sound of a lion, giving Duryodhana joy.

 

 

इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ ।

॥13॥

After that, the conchshells, bugles, trumpets, drums and horns were all suddenly sounded, and the combined sound was tumultuous.

 

इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए ।

॥14॥

On the other side, both Lord Krsna and Arjuna, stationed on a great chariot drawn by white horses, sounded their transcendental conchshells.

 

 

श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया ।

॥15॥

Then, Lord Krsna blew His conchshell, called Pancajanya; Arjuna blew his, the Devadatta; and Bhima, the voracious eater and performer of Herculean tasks, blew his terrific conchshell called Paundram.

 

 

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए I श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्‌! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए ।

॥16-18॥

King Yudhisthira, the son of Kunti, blew his conchshell, the Anantavijaya, and Nakula and Sahadeva blew the Sughosa and Manipuspaka. That great archer the King of Kasi, the great fighter Sikhandi, Dhrstadyumna, Virata and the unconquerable Satyaki, Drupada, the sons of Draupadi, and the others, O King, such as the son of Subhadra, greatly armed, all blew their respective conchshells.

 

 

 

और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए ।

॥19॥

The blowing of these different conchshells became uproarious, and thus, vibrating both in the sky and on the earth, it shattered the hearts of the sons of Dhrtarastra.

 

 

 

हे राजन्‌! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए ।

॥20-21॥

Hey Rajan! After this, Kapidhwaja Arjun tied the front, seeing the Dhritarashtra-relatives, lifting the bow while preparing to walk that weapon, said this word to Hrishikesh Shri Krishna Maharaj- O Achutha! Put my chariot between the two armies.

 

 

और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए ।

॥22॥

And keep standing until I see these opposition warriors desirous of a war in the war zone, with whom I am able to fight in this war form business.

 

 

 

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा ।

॥23॥

Let me see those who have come here to fight, wishing to please the evil-minded son of Dhrtarastra.

 

 

 

संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख ।

॥24-25॥

Sanjaya said: O descendant of Bharata, having thus been addressed by Arjuna, Lord Krishna drew up the fine chariot in the midst of the armies of both parties.

In the presence of Bhisma, Drona and all the other chieftains of the world, the Lord said, Just behold, Partha, all the Kurus assembled here.

 

 

 

इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा ।

॥26॥

There Arjuna could see, within the midst of the armies of both parties, his fathers, grandfathers, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons, friends, and also his fathers-in-law and well-wishers.
When the son of Kunti, Arjuna, saw all these different grades of friends and relatives, he became overwhelmed with compassion and spoke thus.

 

 

 

उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले ।

॥27॥

Arjuna said: My dear Krishna, seeing my friends and relatives present before me in such a fighting spirit, I feel the limbs of my body quivering and my mouth drying up.- Shrimad Bhagwat Geeta

 

॥ जय श्री कृष्ण ॥

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