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Mother Teresa

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Life belongs to the person whose death is mourned by the entire world. Every human comes to die in the world but some people remembered only, those who have made their life meaningful, who have contributed for the country and society, who have their own selfishness Lives for others by sacrificing the personal goals. These people are the greatest among them all. There will hardly be such a list in the world where Mother Teresa name does not come in kind people.

 जिंदगी उसी की है जिसकी मौत पर जमाना शोक करें, यूं तो हर मनुष्य आता है दुनिया में मरने के लिए परंतु लोग उन्हीं को याद करते हैं जिसने अपने जीवन को सार्थक बनाया हो, जिसने देश और समाज के लिए अपना योगदान दिया हो जो अपने स्वार्थ को त्याग कर दूसरों के लिए जीता है वही व्यक्ति महान होता है, दुनिया मैं शायद ही ऐसी कोई सूची होगी जहां दयालु लोगों में मदर टेरेसा का नाम ना आए।

भारत में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में मदर टेरेसा को एक ऐसे इंसान के रूप में जाना जाता है जिसमें अपना सारा जीवन मानवता को समर्पित कर दिया।

Mother Teresa is known not only in India but all over the world as a human being who dedicated her whole life to humanity.

Childhood of mother teresa

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को Skopje,  मेसिडोनिया में हुआ,  बचपन में इनका नाम Agnes Gonxha Bojaxhiu था,  अल्बेनिया परिवार में जन्मी मदर टेरेसा बचपन से ही रोमन कैथोलिक धर्म में आस्था रखती थी और बड़ी होकर एक मिशनरी बनना चाहती थी, बाद में मदर टेरेसा ने अपनी जन्मतिथि को 26 अगस्त के स्थान पर 27 अगस्त कर दिया क्योंकि इसी तारीख को उनको baptise किया गया था।

Mother Teresa was born on 26 August 1910 in Skopje, Macedonia, in childhood she was named ANJEZE GONXHE BOJAXHIU, born in an Albanian family. Mother Teresa believed in Roman Catholicism since childhood and wanted to grow up to be a missionary, later Mother Teresa changed her date of birth to 27 August instead of 26 August because she was baptized on the same date.

उनके पिता का नाम निकोले था जो एक व्यवसाई थे जब मदर टेरेसा 8 वर्ष की थी तब उनके पिता का निधन हो गया उसके बाद उनकी देखरेख की जिम्मेदारी उनकी माता द्राना पर आ गई वह पांच भाइयों- बहनो  में सबसे छोटी थी।

Family of mother Teresa

Her father’s name was Nikola who was a businessman when, Mother Teresa was 8 years old her father passed away, after which the responsibility of her care came to her mother Dranafile. She was the youngest of five brothers & sisters.

मदर टेरेसा एक सुंदर, अध्धयनशील और परिश्रमी लड़की थी, पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें गाने का बहुत शौक था,  वे  अपने बहन के साथ पास के  गिर्जाघर में मुख्य गायिका थी, जब वे   मात्र 12 साल की थी तब उन्हें यह अनुभव हो गया था कि वे अपना   सारा जीवन मानव सेवा में समर्पित करेंगी

Mother Teresa was a beautiful, studious and hard-working girl, very fond of singing along with studies, she was the lead singer in a nearby church with her sister. At the age of  12, she decided that she will dedicate her whole life to human service.

जब मदर टेरेसा 18 साल की हुई तो उस उम्र में उन्होंने सिस्टर ऑफ लोरेटो में शामिल होने का फैसला किया तथा एक मिशनरी बनने के उद्देश्य के साथ इंग्लिश सीखने के लिए आयरलैंड चली गई जहां उन्होंने इंग्लिश सीखी,  सिस्टर टेरेसा आयरलैंड से 6 जनवरी 1929 को कोलकाता के लोरेटो कॉन्वेंट पहुंची,  दार्जिलिंग में उन्होंने बंगाली भाषा सीखी , साथ ही साथ सेंट टेरेसा स्कूल में पढ़ाने लगी।

When Mother Teresa turned 18, at that age she decided to join Sister of Loreto and went to Ireland to learn English with the aim of becoming a missionary where she learned English, Sister Teresa left from Ireland on 6 January 1929 for Calcutta, India. She arrived at the Loreto Convent in Darjeeling, she learned the Bengali language, as well as teaching at St. Teresa’s School.

उन्होंने ANJEZE से अपना नाम बदल कर टेरेसा रख लिया जो की एक प्रशिद्ध नाम Thérèse de Lisieux का स्पेनिश  संस्करण था, वह एक अनुशासित शिक्षिका थी और विद्यार्थी उन्हें बहुत स्नेह करते थे उनका मन शिक्षण में बिल्कुल रंग गया था , परंतु उनके आसपास गरीबी दरिद्रता और लाचारी जो फैली हुई थी उससे उनका मन बहुत अशांत रहता था।

She changed her name from ANJEZE to Teresa, the Spanish version of a well-known name Thérèse de Lisieux. She was a disciplined teacher and students loved her very much, her mind was completely involved in teaching, but she had poverty and poverty around her. The helplessness that spread her nearby was disturbed her mind.

1948 के अकाल में शहर में भारी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई, लोगों का गरीबी से बुरा हाल हो गया था।

During the famine of 1948, a large number of people died in the city, people were in a bad condition from poverty.

1946 के हिंदू-मुस्लिम दंगों से कोलकाता शहर की स्थिति और भयंकर हो गई थी,  इसी वर्ष उन्होंने गरीबों, असहायों , बीमारों , लाचारों की जीवन भर सेवा करने का मन बना लिया उसके बाद उन्होंने पटना के होली फैमिली हॉस्पिटल में नर्सिंग की ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में कोलकाता वापस आ गई और वहां से पहली बार तालतला गई।

The situation in Kolkata city was further aggravated by the Hindu-Muslim riots of 1946, the same year he made up his mind to serve the poor, the helpless, the sick all her life, after which he completed his nursing training at Holy Family Hospital, Patna, and came back to Kolkata in 1948 and from there she went to Talatla for the first time

जहां मदर टेरेसा गरीब बुजुर्गों की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहने लगे , उन्होंने मरीजों की के घाव धोये, उनकी मरहम पट्टी की और उन्हें दवाइयां दी | धीरे-धीरे अपने कार्यों से से वे लोगो का ध्यान अपनी ओर खींचने लगी, लोगों में देश के उच्च अधिकारी और देश के प्रधानमंत्री भी शामिल थे जिन्होंने उनके काम की सराहना की उसके बाद वे सिस्टर टेरेसा, मदर टेरेसा कब बन गई इसका पता ही नहीं चला |  इन दंगो को टेर्रेस ने “call within the call” कहकर वर्णन किया।

There Mother Teresa started living with the caregiver of the poor elderly, she washed the patients’ wounds, bandaged them and gave them medicines. Gradually, she started attracting the attention of the people by her actions, people included high officials of the country and the Prime Minister of the country who appreciated her work, after that she became Sister Teresa to Mother Teresa. she described these riots as “call within the call“.

1949 में टेरेसा से कुछ महिलाएं मिली उनके साथ समाज सेवा करने के लिए और उन्होंने एक साथ मिलकर समाज सेवा करने का प्रण लिया।

In 1949 Teresa met some women to do social service with him and they pledged to do social service together.

मदर टेरेसा के अनुसार इस कार्य में शुरुआती दौर बड़ा ही कठिन था वह लोरेटो छोड़ चुकी थी इसलिए उनके पास कोई आमदनी नहीं थी , पेट भर खाने के लिए भी दूसरों से मदद लेनी पड़ती थी ,जीवन के इस पड़ाव में उन्हें बहुत कुछ सहना पड़ा, अकेलेपन का एहसास भी हुआ वह वापस लौटना चाहती थी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

According to Mother Teresa, the initial phase in this task was very difficult, she had left Loreto, so she had no income, had to seek help from others even for meal, she had to endure a lot in this stage of life, She also felt lonely, she wanted to return but she did not give up.

और 7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वेटिकन से मिशनरी ऑफ चैरिटी की स्थापना की अनुमति मिली, इस संस्था का उद्देश्य गरीबों और लाचारों की मदद करना था जिनके लिए उनके लिए समाज में कोई विशेष जगह नहीं था।

And on 7 October 1950, he received permission from the Vatican to establish the Missionary of Charity, an institution aimed at helping the poor and helpless for whom there had no special place in society.

मदर टेरेसा ने निर्मल हृदय और निर्मला शिशु भवन के नाम से आश्रम खोलें।

Mother Teresa opens her ashram in the name of Nirmal Hriday and Nirmala Shishu Bhavan

निर्मल हृदय का उद्देश्य असाध्य बीमारियों से पीड़ित लोगों की मदद करना और गरीबों की सेवा करना था जिन्हे समाज ने बाहर कर दिया था।

The aim of the Nirmal Hriday was to help the people suffering from incurable diseases and to serve the poor, which the society had excluded.

निर्मला शिशु भवन की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई,  शुरुआत में यह एक छोटा सा धार्मिक समूह था जिसमें केवल 13 लोग ही शामिल थे परंतु 1997 तक इसमें 4000 से ज्यादा सदस्य जुड़ चुके थे |वह कहते हैं ना सच्ची लगन और मेहनत से किया हुआ काम कभी असफल नहीं होता यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई ।

Nirmala Shishu Bhavan was established to help orphans and homeless children, initially, it was a small religious group consisting of only 13 people but by 1997 it had more than 4000 members. True passion and Hard work never fails, and this comes true with Mother Teresa.

 मदर टेरेसा को मानवता की सेवा के लिए अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया गया भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री और 1980 में देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया और USA ने उन्हें वर्ष 1985 में मेडल ऑफ फ्रीडम से अलंकृत किया | मानव कल्याण के लिए किए गए कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 मे नोबेल शांति पुरस्कार मिला उन्हें यह पुरस्कार गरीबों, असहायों की सहायता के लिए दिया गया।

mother teresa awards

Mother Teresa was honoured with many international honours and awards for her service to humanity, the Government of India honoured her with the Padma Shri in 1962 and the Bharat Ratna, the country’s highest civilian award in 1980, and the USA awarded her with the Medal of Freedom in 1985. Due to the work done for human welfare, Mother Teresa received the Nobel Peace Prize in 1979, she was given this award for helping the poor and helpless.

मदर टेरेसा ने  नोबेल पुरस्कार की धनराशि $192000 गरीबों के लिए फंड के रूप में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया। मदर टेरेसा को कई सालों से दिल और किडनी की परेशानी थी 1997 में जब उनकी हालत बिगड़ी तब उन्होंने मार्च 1997 को मिशनरी ऑफ चैरिटी के अधिकारी का पद छोड़ दिया और 5 सितंबर 1997 को कोलकाता में उनका निधन हो गया।

Mother Teresa decided to use the Nobel Prize money of $ 192000 as a fund for the poor. Mother Teresa had heart and kidney problems for many years when her condition deteriorated in 1997, she left the post of Missionary of Charity officer on March 1997 and died on 5 September 1997 in Calcutta.

उनका कहना था-  यदि हमारे बिच शांति की कमी है  तो वह केवल इसलिए क्यूंकि हम भूल गए है की हम एक दूसरे से सम्बंधित है

She said – “if there is a lack of peace between us, it is only because we have forgotten that we are related to each other.

अगर उनकी शिक्षा को अपनाते रहें तो निश्चित रूप से समाज को एक नई दृष्टि और दिशा मिलेगी और समाज में शांति हमेशा बनी रहेगी।

If we continue to adopt her educations & thoughts, then the society will definitely get a new vision and direction and peace will always remain in the society.

9 सितंबर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि संत की उपाधि से विभूषित किया।

On 9 September 2016, Pope Francis in Vatican City adorned Mother Teresa with the title of “Saint”.

CRITICISM

दोस्तों कुछ लोगों के लिए मदर टेरेसा एक मां का रूप थी परंतु उन सबसे विपरीत कुछ ऐसे भी लोग थे जो उन्हें संत नहीं अपितु शैतान मानते थे मदर टेरेसा अपने मरने के बाद और उससे पहले भी कई विवादों से जुड़ी रही और उनके ऊपर लोगों ने धर्म परिवर्तन करने से लेकर लोगों को बुरे हाल में रखने के आरोप लगाए ।

Friends, Mother Teresa was the form of a mother to some people, but unlike them, there were others who considered her not a saint but a devil, Mother Teresa was involved in many controversies after her death and even before that, and people accused her of converting people’s religion to Christianity and keeping people in bad conditions.

2013 के एक अध्ययन में पाया गया कि उनके मृत्यु के समय 100 से ज्यादा देशों में उनकी संस्थाएं चल रही थी जहां बीमार और असहाय लोगों का उपचार किया जाता था परंतु उन सभी संस्थाओं में कोई भी स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं था सारे के सारे मिशन सिस्टर्स के द्वारा चलाया जाता था | पैसों की कमी ना होने के बाद भी उन गरीबों का इलाज सही से नहीं किया जाता था अपितु उन सभी पैसों का इस्तेमाल लोगों के धर्म परिवर्तन और धर्म प्रचार के लिए किया जाता था।

In a study in 2013 found that at the time of her death, she had institutions running in more than 100 countries where sick and helpless people were treated, but there was no specialist doctor in all those institutions, it was run by all the sisters. Despite having the huge amount of fund, those poor were not treated properly, but all those money were used for the conversion of the people and for religious propagation.

वहां रोगियों को खाने के लिए अच्छा भोजन नहीं दिया जाता था इतना ही नहीं उन क्लीनिक में पेन किलर तक नहीं हुआ करते थे,  चिकित्सा देखभाल के नाम पर लोगों का धर्म परिवर्तन किया जाता था और पीड़ितों को केवल JESUS के सहारे छोड़ दिया जाता था |एक बार टेरेसा ने एक रोगी को कहा कि अगर आपको दर्द हो रहा है तो उसका मतलब यह है कि JESUS आपके समीप है , और आपकी पीड़ा का अर्थ है की JESUS आपको चूम रहे हैं |

Their patients were not given good food to eat, not only that, there were no pain killers in those clinics. People were converted in the name of medical care and the victims were left only with the help of JESUS. Once Teresa told a patient that if you are in pain, it means that JESUS ​​is near you, and your pain means that JESUS ​​is kissing you.

मदर टेरेसा का सबसे मुखर आलोचक में से एक था इंग्लिश पत्रकार क्रिस्टोफर हिचेंस, जिसने मदर टेरेसा के बारे में “मिशनरी पोजिशन –मदर टेरेसा इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस” में यह लिखा कि मदर टेरेसा गरीबों की दोस्त नहीं रही बल्कि ने गरीबी की दोस्त है ।

One of Mother Teresa‘s most outspoken critics, the English journalist Christopher Hitchens, who wrote about Mother Teresa in “The Missionary Position – Mother Teresa in Theory and Practice” that Mother Teresa was not a friend of the poor but a friend of povert ,

जिसका मानना था की  पीड़ा जीसस का तोहफा है इतना ही नहीं उन्होंने लिखा कि टेरेसा एक रूढ़िवादी विचारधारा की महिला है जो महिलाओं को उनका हक़ नहीं देना चाहती थीं, उन्हें आज़ादी नहीं देना चाहती थीं, औरतों को सशक्त नहीं करना चाहती थी अपितु उन्हें केवल बच्चे पैदा करने के लिए रखना चाहती थी ।

Who believed that suffering is the gift of Jesus. Not only that, he wrote that Teresa is a conservative-minded woman who did not want to give women her rights, did not want to give them freedom, did not want to empower women, but she wanted to keep them only to produce babies.

यहां तक कि उन्होंने मदर टेरेसा को पाखंडी तक कह डाला क्योंकि भारत में अपने क्लीनिकों में पैन किलर तक नहीं रखती थी और अपने खुद का इलाज पश्चिमी देशों में करवा रही थी , तो क्या वे खुद जीसस के पास नहीं जाना चाहती थी या फिर यह सब कुछ और ही था???

He even called Mother Teresa as hypocritical because she did not even have a pain killer in her clinics in India and was treating herself in Western countries, did she not want to go to Jesus herself or all this Was there anything else ???

मदर टेरेसा से मुलाकात के दौरान हिट्चेंस ने उनसे किये वार्तालाप को कुछ इस तरह बताया है-

During the meeting with Mother Teresa, Hitchchans described the conversation with her as follows –

टेरेसा ने उनसे  कहा कि वह गरीबी कम करने के लिए काम नहीं कर रही थी, वह केवल और केवल चर्च के लिए काम कर रही है जिसका मकसद कैथोलिक की आबादी को बढ़ाना है, मैं कोई समाजसेवी नहीं हूं और ना ही कुछ ऐसा करती हूं मैं यह सब सिर्फ JESUS के लिए करती हूं यह सब मैं चर्च के लिए करती हूं ।

Teresa told him that she was not working to reduce poverty, she was working only and only for the church which aims to increase the Catholic population, I am not a philanthropist nor do I do anything, I do all this only for JESUS, I do all this for the church.

भारत में हुए आपदाओं के लिए मदर टेरेसा ने कभी पैसे से मदद नहीं करी केवल प्रार्थनाएं की जबकि उनके पास पर्याप्त मात्रा में धन था ।

Mother Teresa never helped with money for the disasters in India, she only prayed, even when she had enough fund to help the victims.

तो दोस्तों यह था हमारा आज का आर्टिकल जो मदर टेरेसा के ऊपर था, जिनका जीवन एक  संघर्ष था जो गरीबों और असहाय के लिए किया गया था  विवादों और आलोचनाओं से भरा उनका जीवन  किसी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बना तो किसी के लिए घृणा का।

So, friends, this was our present-day article on Mother Teresa, whose life was a struggle that was dedicated to the poor and helpless. Her life was full of controversies and criticisms but for someone, she became a source of inspiration and hatred for someone.

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Narendra Modi

Narendra Modi

About Narendra Modi – नरेन्द्र मोदी का जीवन परिचय।

Narendra Modi was born on 17 September 1950 in Vadnagar, Mehsana district, Bombay State (present-day Gujarat) to a poor family of Modh-Dhana Ghanchi-Teli (Tel-Dab), who were supported by the Government of India from the Other Backward Classes (OBC) Is classified as done. Modi’s father’s name is Manodardas Moolchand Modi (1915-1989) and mother’s name is Hiraben Modi (born 1920.), the third son of the six saints of his parents, Narendra Modi.

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नरेन्द्र मोदी जी (Narendra Damodardas Modi) का जन्म 17 सितंबर 1950 को वडनगर, मेहसाणा जिले, बॉम्बे राज्य (वर्तमान गुजरात) में मोध-घांची-तेली (तेल-दाब)  के एक गरीब परिवार में हुआ, जिसे भारत सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग(OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मोदी जी के पिता का नाम दामोदरदास मूलचंद मोदी (1915-1989.) और माता का नाम हीराबेन मोदी (जन्म 1920.) हैं, अपने माता-पिता की कुल छ: संतानों में तीसरे पुत्र नरेन्द्र मोदी हैं।

मोदी जी के पिता वाडनगर रेलवे स्टेशन के पास एक चाय की दुकान चलाया करते थे। घर की आर्थिक स्तिथि कमज़ोर होने के कारण मोदी जी स्कूल से वापस आकर घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए अपने पिता के साथ चाय बेचने में मदद किया करते थे । और रेलवे स्टेशन और ट्रेन के डिब्बों में चाय बेचा करते थे । आज भी मोदी जी इस बात को बताने में कभी नहीं कतराते है कि वह ट्रेनों में चाय बेचा करते थे ।

Modi’s father runs a tea shop near Vadnagar railway station. Due to the poor economic condition of the house, Narendra Modi came back from school and used to help him sell tea with his father to strengthen the economic condition of the house. And sell tea at railway stations and in trains. Even today, Modi never hesitates to state that he used to sell tea in trains.

नरेन्द्र मोदी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वाडनगर के एक सरकारी स्कूल से ग्रहण की और 1967 में बी. एन. स्कूल (B. N. School) से उच्च माध्यमिक शिक्षा पूर्ण की। स्कूल में मोदी जी एक औसत दर्जे के छात्र थे लेकिन नाटकों और भाषणों में जमकर हिस्सा लिया करते थे और एक मजबूत पक्ष रखा करते थे । मोदी जी खेलकूद में भी दिलचस्पी रखते थे और एक बहुत अच्छे तैराकी भी थे । मोदी जी वाद-विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में बहुत रूचि रखते थे । मोदी जी को बहस में बयानबाजी के लिए एक प्रारंभिक उपहार भी मिला था, उन्हें राजनीतिक विषयों पर नई-नई परियोजनाओं को प्रारंभ करने में भी बहुत रूचि थी।

Narendra Modi received his early education from a government school in Vadnagar and in 1967 Completed higher secondary education from B. N. School. In school, Narendra Damodardas Modi was a mediocre student but used to take part in plays and speeches and kept a strong side. Modi also interested in sports and was a very good swimmer. Modi was very much interested in debate and drama competitions. Received an initial gift for rhetoric in the debate, interested in starting new projects on political subjects.

मोदी जी को किताबें पढ़ने का शौक़ था वे घंटो तक पुस्तकालय में महान लोगों के बारे में पढ़ा करते थे इस बीच जिस व्यक्ति ने उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वो थे स्वामी विवेकानन्द । देश के प्रति स्वामी विवेकानन्द जी के योगदान से मोदी काफ़ी प्रेरित हुए और उन्हें अपना प्रेरणास्त्रोत बना लिया ।

Narendra Modi was fond of reading books, he read about great people in the library for hours, meanwhile, the person who influenced him the most was Swami Vivekananda. Modi was greatly inspired by Swami Vivekananda’s contribution to the country and made him his inspiration.

नरेन्द्र मोदी जीराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ाव और संघर्ष।

Narendra Modi‘s- Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) affiliation and struggle.

8 वर्ष की उम्र में नरेन्द्र मोदी जी ने 1958 के शुरुआती दिनों में निस्वार्थता, सामाजिक जवाबदारी, समर्पण, और राष्ट्रवाद की भावना को आत्मसात कर आर.एस.एस (RSS) (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की शाखा पर जाना शुरू कर दिया था । जब वे विश्वविद्यालय में पढ़ते थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की शाखा में नियमित जाने लगे थे ।

Narendra Modi‘s Wife

13 वर्ष की आयु में नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की सगाई जसोदाबेन चमनलाल के साथ कर दी गई और मात्र 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह करा दिया गया। उनकी शादी जरूर हुई परंतु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ वर्षों बाद नरेन्द्र मोदी जी ने घर त्याग दिया । कथित तौर पर उनकी शादी कभी नहीं हुई थी और उन्होंने इसे गुप्त रखा अन्यथा वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ‘प्रचारक’ नहीं बन सकते थे। मोदी जी ने अपने करियर के अधिकांश समय के लिए अपनी शादी को गुप्त रखा। मोदी पहली बार अपनी पत्नी को स्वीकार किया जब उन्होंने 2014 के आम चुनावों के लिए अपना नामांकन दाखिल किया।

At the age of 8, Narendra Modi started assimilating the spirit of selflessness, social responsibility, dedication, and nationalism in the early days of 1958 and started visiting the RSS branch. From the time he studied in the university, he started going regularly to the branch of the Rashtriya Swayam Sevak Sangh (RSS).

At the age of 13, Narendra Modi was engaged to Jasodaben Chamanlal (narendra modi wife name) and he was married at the age of just 17. They did get married, but the two never lived together. After few years of marriage, Narendra Modi Ji left the house. He was reportedly never married and kept it a secret otherwise he could not become a ‘pracharak’ in the Rashtriya Swayamsevak Sangh. Modi kept his marriage a secret for most of his career. Modi accepted his wife for the first time when she filed her nomination for the 2014 general elections.

घर त्यागने के बाद मोदी जी ने हिन्दू आश्रम सहित अगले दो साल की यात्रा शुरू की कर दी थी । इस दौरान वह हिमालय से लेकर कई आश्रमों से होते हुए मठ, कोलकाता और असम गए। उन्हीं दिनों स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन का और भी गहरा प्रभाव उन पर पड़ा जबकि स्वामी विवेकानन्द जी बचपन से ही मोदी जी प्रेरणास्रोत रहे थे ।

After leaving the house, Modi started the journey for the next two years including the Hindu ashram. During this time, he traveled from the Himalayas to several ashrams to the monastery, Kolkata and Assam. At the same time, the life of Swami Vivekananda had a more profound impact on him, whereas Swami Vivekananda had been an inspiration to Modi since childhood.

अपने दो वर्षो की यात्रा से वापस अपने घर वाडनगर आने के बाद मोदी जी ने अहमदाबाद में अपने चाचा जी के साथ बस स्टैंड पर चाय की दुकान पर काम करने का निर्णय लिया और अहमदाबाद में कुछ दिन काम करने के बाद उन्होंने एक साइकिल खरीद कर साइकिल द्वारा चाय बेचते थे और अहमदाबाद के गीता मंदिर पर चाय बेचा करते थे ।

After coming back home to Vadnagar from his two-year journey, Modi decided to work with his uncle in Ahmedabad at a tea shop at the bus stand and after working for a few days in Ahmedabad, he bought a bicycle and Use to sell tea at the Geeta Temple in Ahmedabad.

1971 में अहमदाबाद आरएसएस (RSS) के प्रचारक के रूप में खुद को जोड़ लिया अपना सारा समय आरएसएस (RSS) को देने लगे । प्रचारक होने के नाते वे गुजरात की जनता से जुड़कर उनकी सभी समस्याओं को समझा और बाद में बीजेपी के आधार को मजबूत करने में एक अहम भूमिका निभाई ।

In 1971, he joined himself as an RSS (RSS) pracharak and devoted all his time to RSS. Being a pracharak, he joined the people of Gujarat and understood all their problems and later played an important role in strengthening BJP’s base.

1975 इमरजेंसी भारतीय राजनीति इतिहास में सबसे बड़े काले दिन के रूप में माना जाता है। 1975 इमरजेंसी के दौरान सभी दलों को बंद करने का आदेश दे दिया गया और आरएसएस को बंद कर दिया गया जिसके तहत आरएसएस (RSS) प्रचारकों को जेल में डाला जाने लगा। इमरजेंसी के दौरान मोदी भेष बदलकर घूमा करते थे और सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों का विरोध करते थे। इमरजेंसी के दौरान मोदी ने एक किताब भी लिखी थी जिसका नाम “संघर्ष मा गुजरात” था । किताब में मोदी जी ने गुजरात की राजनीति के बारे में बताया था ।

1975 Emergency is considered as the biggest black day in the history of Indian politics. During the 1975 Emergency, all parties were ordered to be shut down and the RSS was shut down under which RSS (RSS) campaigners were put in jail. Modi turned around disguised and opposed the decisions taken by the government. During the Emergency, Modi also wrote a book called “Sangharh Ma Gujarat”. In the book, Modi told about the politics of Gujarat.

राजनीति में मोदी।

Narendra Modi in Politics.

आरएसएस (RSS) के अंतर्गत बेहतरीन काम के चलते उन्हें बीजेपी (BJP) में नियुक्त किया गया और गुजरात का आयोजन सचिव (Organising Secretary) की कमान सौंप दी गई । जिसके बाद मोदी ने 1990 में लालकृष्ण आडवाणी जी की अयोध्या राम रथ यात्रा और 1991-1992 में मुरली मनोहर जोशी जी की एकता यात्रा (Journey for Unity) का आयोजन किया । मोद जी के कार्य-कौशल को देखते हुए बीजेपी (BJP) के वरिष्ठ नेता मोदी जी से काफी प्रभावित हुए और इन सब के चलते मोदी जी का महत्व बीजेपी के अंतर्गत बढ़ता चला गया ।

Due to his excellent work under the RSS, Modi appointed to the BJP and was given the command of Organizing Secretary of Gujarat. After which Modi organized LK Advani’s Ayodhya Ram Rath Yatra in 1990 and Murali Manohar Joshi’s Ekta Yatra (Journey for Unity) in 1991-1992. In view of Modi’s working skills, senior BJP leaders impressed with Modi and due to all this, the importance of Modi continued to grow under BJP.

1995 विधानसभा चुनावों में भारी-मतों से जीत दर्ज कर बीजेपी (BJP) ने गुजरात में सरकार बनाई औंर केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। और नरेन्द्र  मोदी को दिल्ली में केंद्रीय मंत्री के तौर पर महासचिव (General Secretary) और इसके साथ-साथ 4 राज्यों का प्रभारी बना दिया गया।

In the 1995 assembly elections, the BJP won the government in Gujarat and Keshubhai Patel was made the Chief Minister of Gujarat. And Narendra Modi as the Union Minister in Delhi made the General Secretary and in-charge of 4 states simultaneously.

2001 में केशुभाई पटेल की तबीयत बिगड़ने के चलते बीजेपी ने 1 अक्टूबर 2001 में नरेन्द्र मोदी जी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी और नरेन्द्र मोदी जी ने 7 अक्टूबर 2001 से अपना कार्यकाल शुरू किया ।

Gujarat Chief Minister Narendra Modi

Due to the deteriorating health of Keshubhai Patel in 2001, BJP handed over the command of Gujarat Chief Minister to Narendra Modi on 1 October 2001 and Narendra Modi started his term from 7 October 2001.

मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने गुजरात की सारी समस्याओं को जैसे हल करने का बीड़ा ही उठा लिया और टूरिज्म (Tourism) को बढ़ावा दिया गांव-गांव बिजली पहुंचाई और बड़े-बड़े सोलर प्लांट का निर्माण भी गुजरात में किया गया । एशिया (AISA) के सबसे बड़े सोलर प्लांट का निर्माण भी गुजरात में किया गया । सभी नदियों को एक-दूसरे से जोड़ दिया गया जिससे बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं से निपटा जा सके । और भी कई अच्छे कार्य कर गुजरात को बुलंदियों की ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया जिससे गुजरात भारत का सबसे बेहतरीन राज्य बन गया।

After Modi became the Chief Minister of Gujrat, he took the initiative to solve all the problems of Gujarat and encouraged tourism and provided electricity to every village and the big solar plant was also constructed in Gujarat. The largest solar plant in ASIA built in Gujarat. All the rivers connected to each other to deal with disasters like floods and droughts. After doing many good works, he took Gujarat to the heights of heights, making Gujarat the best state in India.

गोधरा कांड

Godhra Scandal.

नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi’s) के जीवन में गोधरा कांड एक फांस की तरह था जिससे नरेन्द्र मोदी की छवि पर कई सवाल उठाये गए और उनके मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े की भी माँग की गई थी।

27 फरवरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर खड़ी साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगाकर कर जला दिया गया को जला दिया गया और अयोध्या से आने वाले 59 निर्दोष यात्रियों की हत्या दी गई। जिसके बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। 28 फरवरी 2002 को दंगा इतना बढ़ गया कि उन 2 दिनों में 1200 निर्दोष लोगो ने अपनी जान गवां दी । हाईकोर्ट द्वारा एसआईटी (SIT) का गठन किया जो इस पूरे मामले की जांच करें । जिसमे के गुजरात मुख्यंमत्री नरेन्द्र मोदी का नाम आया जो उनके जीवन में एक दाग़ था। 2010 में एसआईटी (SIT) द्वारा कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट  के आधार पर कोर्ट द्वारा फैसला सुनाया गया कि गोधरा कांड में नरेन्द्र  मोदी का कोई हाथ नहीं था।

The Godhra incident was like a trap in Narendra Modi’s life, raising many questions on the image of Narendra Modi and demanding his resignation from the post of Chief Minister.

On 27 February 2002, the coaches of the Sabarmati Express parked at Godhra railway station were set ablaze and burned to death and 59 innocent passengers arriving from Ayodhya were killed. After which communal riots broke out in Gujarat. After which communal riots broke out in Gujarat. On 28 February 2002, the riot increased so much that 1200 innocent people lost their lives in those two days. The High Court constituted the SIT to investigate the entire matter. In which the name of Gujarat Chief Minister Narendra Modi came, which was a stain in his life. On the basis of the report submitted to the court by the SIT in 2010, the court ruled that Narendra Modi had no hand in the Godhra carnage.

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री

Narendra ModiChief Minister to Prime Minister.

नरेन्द्र  मोदी के ठोस, अच्छे और तेजी से निर्णय लेने की क्षमता की वजह से गुजरात के लोगों ने उन्हें चार बार मुख्यमंत्री बनाया । गुजरात में नरेन्द्र  मोदी की लोकप्रियता देख बीजेपी (BJP) के वरिष्ठ नेताओं ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए नरेन्द्र  मोदी का नामांकन किया और प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया । जिसके बाद नरेन्द्र  मोदी ने संपूर्ण भारत में अलग-अलग शहरों, नगरों और  गांवों में घूम-घूम कर कई सारी रैलियां की और लाखों करोड़ों लोगों तक अपनी बात टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम से पहुंचाई । जिसके फलस्वरूप भारत की सम्पूर्ण जनता ने बीजेपी (BJP) को भारी (543/282) मतों से जीता कर अपने-आप एक रिकॉर्ड बना दिया और नरेन्द्र  मोदी भारत के  पंद्रहवे प्रधानमंत्री बने ।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद के सफर को हम अपने अगले आर्टिकल में प्रस्तुत करेंगे ।

Narendra Modi‘s solid, good and fast decision-making ability made the people of Gujarat four times chief minister. Seeing the popularity of Narendra Modi in Gujarat, senior BJP leaders nominated Narendra Modi for the 2014 Lok Sabha elections and declared him as the Prime Ministerial candidate. After this, Narendra Modi has roamed in various cities, towns and villages all over India, through many rallies and spread his talk to millions of people through TV and social media. As a result, the entire people of India won the BJP (BJP) by a huge (543/282) votes and automatically set a record and Narendra Modi became the 15th Prime Minister of India.

We will present the journey after Narendra Modi became Prime Minister in our next article.

जय हिन्द (Jai Hind)

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पानीपत की तीसरी लड़ाई

पानीपत की तीसरी लड़ाई

4500 वर्षों पुरानी सभ्यता के रूप में जाने वाला भारतवर्ष पूरे विश्व में विख्यात है, सदियों से सोने की चिड़िया से मशहूर भारतवर्ष का इतिहास हमेशा से ही पेचीदा रहा है एक तरफ खुशियों तो दूसरी तरफ दुख और दर्द है, इस देश ने अपने इतिहास के पन्नो में समेट रखा है। आज की कहानी भी भारतीय इतिहास में सबसे विनाशकारी युद्ध के बारे में है जिसमें करीबन 40,000 योद्धा मारे गए तथा जो पानीपत की तीसरी लड़ाई (third battle of Panipat) से जाना जाता है।

18वीं सदी की शुरूआत हो चुकी थी मुग़ल शासक औरंगजेब (aurangzeb) की मृत्यु के बाद वर्षों से भारत की धरती पर राज करते मुगलों का शासन (Mughal empire) अब कमजोर पड़ने लगा था तो दूसरी तरफ उन दिनों मराठाओं (marathas) की ताकत दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी ।

पेशवा बाजीराव (Peshwa bajirao) के निर्देश में राजपूताना, मालवा व गुजरात के राजा अब मराठों के साथ मिलकर अपनी शक्ति का विस्तार करने लगे थे । मराठाओं के बढ़ते आक्रमणों से मुगल साम्राज्य (Mughal empire) की कमर टूट गई थी । अब जहां किसी समय मुगलों का शासन होता था अब उन जगहों पर मराठाओ के भगवा परचम लहरा रहे थे ।

1758 में पेशवा बाजीराव के पुत्र (Peshwa bajirao son) बालाजी बाजीराव ने पंजाब पर विजय प्राप्त की और मराठों की जीत का बिगुल बजाकर मराठा साम्राज्य के शक्तिशाली होने का संकेत सम्पूर्ण भारत में दिया था। जिस तरह विजय के परचम लहराने के साथ-साथ मराठा साम्राज्य विख्यात हो रहा था वैसे- वैसे उनके शत्रुओं की संख्या भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी ।

1707 के बाद शिवाजी महाराज (chhatrapati shivaji maharaj) का संपूर्ण भारत पर मराठाओं का राज होने का सपना पूरा करने पूरा होने की कोशिश में था । 1758 में मराठों ने दिल्ली के साथ-साथ लाहौर पर भी विजय प्राप्त कर तैमूर शाह दुर्रानी को उस इलाके से खदेड़ दिया । तैमूर शाह दुर्रानी अफगानी नवाब अहमद शाह अब्दाली का पुत्र था ।

अब्दाली का आगमन।– पानीपत की तीसरी लड़ाई

समय के साथ-साथ मुगल शासक दो भागों में विभाजित हो गए थे पहले वो जो भारतीय मुस्लिम थे और दूसरे वो जो बाहर से आकर भारत में शासन कर रहे थे । मराठा भारतीय मुस्लिमों के पक्ष में थे अब बाहरी मुस्लिम शासक नजीब खान जैसे शासकों ने अपनी मदद के लिए विदेशी सहायक के इंतजार में थे जो उन्हें अब्दाली के रूप में मिला जिसे विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था ।

1739 में मुगल शासको द्वारा नादिरशाह को भी इसी तरह आमंत्रित किया गया था किंतु नादिरशाह ने भारत को लूटते समय हिंदू-मुस्लिम में कोई भेद-भाव नहीं रखा था और साथ ही 100 करोड की संपत्ति के साथ मुगल मयूर मुकुट सहित कोहिनूर हीरा भी लूटकर ले गया था ।

अपने पुत्र तैमूर शाह दुर्रानी को हारा देख अब्दाली को मराठाओं की यह हरकत नागवार गुजरी और उसने भारतवर्ष पर आक्रमण करने का मन बना लिया । वर्ष 1757 के दौरान पेशावर में दत्ता जी सिंधिया को हराकर अब्दाली भारत में घुसा और सबसे पहले पंजाब के उन इलाकों को चुना जहां पर मराठों की सेना कम थी और पंजाब, मुल्तान और कश्मीर जीतने के बाद दिल्ली को जीतने के लिए अपनी सेना के साथ आगे बढ़ने लगा। 1759 में अब्दाली ने पश्तून तथा बलोच जनजातियों को इकट्ठा कर अपनी सैन्य ताकत को मजबूत कर लिया था ।

असल में अब्दाली का मंसूबा भारत को लूटने का नहीं था बल्कि दिल्ली में बैठे मोबाइल सिहासन को मुगलों से छीना था इसी मंसूबे के साथ अब्दाली ने उत्तरी में बसे अफगानी भाषाओं को अपने पक्ष में कर लिया था जिसका फायदा बाद में अब्दाली को मिला ।

मराठाओं की ताकत ।

14 अप्रैल 1760 को मराठा सेना सदाशिव राव भाऊ के निर्देशन में पुणे से दिल्ली की तरफ रवाना हुई उस समय उनकी सेना में 50,000 पैदल सैनिक थे । जैसे-जैसे मराठा सेना दिल्ली की तरफ बढ़ते गए वैसे-वैसे उनके समर्थकों की सेना भी मराठाओं की सेना में शामिल होकर उनकी संख्या बढ़ाती चली गई । महिंदले, शमशेर बहुर, पवार, बड़ौदा के गायकवाड और मकेश्वर जैसों की सेनाओं ने मराठों की सेनाओं को दोगुना कर दिया था ।

इब्राहिम खान गर्दी का भी मराठों की सेना मैं एक विशेष योगदान रहा था गर्दी के पास फ्रांस निर्मित राइफल के साथ 8,000 फ्रांसिसी प्रशिक्षित सैनिको ने मराठों की सेना को और भी विशाल रूप दे दिया था । गर्दी के पास उस समय 200 उत्कृष्ट बंदूके तथा युद्ध तोपे भी थी ।

मई-जून के बीच मराठा आगरा पहुंचे तब तक मल्हार राव होलकर तथा जानकोजी सिंधिया भी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ मराठों में शामिल हो चुके थे । जब मराठा दिल्ली पहुंचे तब मराठाओं की सैन्य शक्ति दो लाख तक बढ़ चुकी थी ।

दूसरी तरफ मराठाओं की बढ़ती ताकत के कारण कुछ मुगल शासक मराठाओं की मदद के लिए संधिबद्ध थे वे मराठों के बढ़ती ताकत से खुश नहीं थे और दिल्ली में मराठों की समर्थकों की संख्या बहुत कम थी ।

इस बार मराठाओं का सीधा सामना अफगानी नवाब अहमद शाह अब्दाली के साथ था । उस समय मराठों की कमान पेशवा बाजीराव के पुत्र बालाजी बाजीराव के हाथों में थी बालाजी बाजीराव ने अपने पुत्र विश्वास राव को मुगल साम्राज्य की गद्दी पर बिठाने का मन बना लिया था । मराठों द्वारा अब्दाली के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया गया और मराठा अब अब्दाली को खदेड़ने के साथ-साथ बंगाल में बढ़ती हुई ब्रिटिश ताकतों को भी खत्म करने के लिए कमर कस चुके थे अगर मराठों का यह सपना पूरा होता तो ब्रिटिश शासन की शुरुआत होने से पहले ही उनका अंत हो जाता परंतु अपने ही कमियों के कारण कमजोर पड़े और युद्ध हार गए।

पानीपत की तीसरी लड़ाई

14 जनवरी 1761 मकर सक्रांति के दिन हरियाणा में स्थित पानीपत के मैदान में मराठों और अफगानों की सेनाएं आमने-सामने थी जिसके बाद रण में शुरू हुआ मौत का मंजर जिसने करीब 40,000 हज़ार से भी ज्यादा लोगो को काल का ग्रास बना दिया ।

इब्राहिम गर्दी की बंदूकों और युद्ध तोपों ने रण में हाहाकार मचा दिया था ऐसा विश्वास होने लगा था जैसे मराठा आज सुनहरे शब्दों में इतिहास लिख बैठेंगे किंतु शाम होते-होते युद्ध पूरी तरह बदल चुका था दोनों तरफ के करीबन 40,000 सैनिक मारे जा चुके थे पेशवा के पुत्र भाऊ विश्वास राव, जसवंत राव, पवार तथा जानकोजी सिंधिया के साथ-साथ कितने ही योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे ।

इस विनाशकारी युद्ध का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र का कोई भी ऐसा घर नहीं था जिसने इस युद्ध में किसी अपने सगे-संबंधी को खोया नहीं था मराठों और मराठों की ओर से मरने वाले सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिक भी थे जो सेना के साथ तीर्थ यात्रा के लिए जा रहे थे, मराठाओं को हराने के बाद अब्दाली अपनी सेना के साथ इन आम नागरिकों को मारते हुए आगे बढ़ता चला गया । पुरुषों को मार दिया गया तथा महिलाओं व बच्चों को गुलाम बना लिया गया और इस तरह मराठाओं की हार हुई ।

पानीपत की तीसरी लड़ाई- मराठाओं की हार का कारण।

मराठा और राजपूतों के बीच घनिष्ठता थी, वर्ष 1750 में मराठा राजपूतों के आपसी झगड़ो में हस्तक्षेप करने लगे और किसी एक का पक्ष लेने लगे इस तरह उन्हें दूसरे पक्ष की नाराज़गी झेलनी पड़ी जो उनकी जीत लिए गलत साबित हुई ।

राजा सूरजमल और सदाशिव राव के बीच आपसी मतभेदों के चलते सदाशिव राव ने राजा सूरजमल की ओर ध्यान ना देते हुए राजा सूरजमल को युद्ध की जानकारी में कम आँका जो उनकी हार का कारण बनी। उन्हीं दिनों जब राजा सूरजमल ने दिल्ली का गवर्नर बनने की इच्छा जाहिर की तब मराठों ने उन्हें छोड़ सिराजुद्दौला को चुना जिस कारण राजा सूरजमल का विश्वास मराठों में कम हुआ ।

सिराजुद्दौला को दिल्ली के लिए चुनने के लिए मराठों के पास दो प्रमुख कारण थे पहला कारण था कि उसके पास 50,000 मजबूत घुड़सवार सेना थी और दूसरा सिराजुद्दौला शिया मुस्लिम था जो कि अफगानी सुन्नी मुस्लिमों के पक्ष में कभी नहीं जा सकता था । दिल्ली की कमान सिराजुद्दौला को सौंपने का मराठों का निर्णय गलत साबित हुआ जब अब्दाली ने इस्लामिक एकता का आधार बनाकर उद्दौला को अपने पक्ष में कर लिया और मराठों के खिलाफ खड़ा कर दिया था ।

अब्दाली की जीत और मराठाओं की हार का एक प्रमुख कारण अब्दाली की सेना नहीं थी बल्कि मराठाओं की सेना को ठंड और उनके प्रबंधन ने हराया था । मराठा सेना युद्ध स्थल के मौसम से बिल्कुल अनजान थी और धोती व कुर्ते में हथियारों के साथ जंग के मैदान में कूद पड़ी थी पतले कपड़ों की वजह से मराठों की सेना सर्दी के कारण कमजोर पड़ गई जबकि दूसरी तरफ अब्दाली को युद्ध स्थल में मौसम के बारे में अच्छी तरह जानकारी थी जिसका परिणाम यह निकला कि उसने अपनी सेना को ठंड से बचाने के लिए एक मजबूत पोशाक पहना कर युद्ध के मैदान में उतारा था ।

एक तरफ सदाशिव राव की भावुकता ने मराठों की हार पहले ही सुनिश्चित कर दी थी दरअसल युद्ध के मैदान में लड़ते समय विश्वास राव भाऊ को गोली लग गई, विश्वास राव सदाशिव राव के अत्यंत प्रिय थे उन्हें ऐसी हालत में देख सदाशिव राव अपने हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हो गए और विश्वास राव के पास पहुंचे इधर सदाशिव राव को हाथी पर ना पाकर मराठा सेना डर गई और यह समझ बैठी की सदाशिव राव वीरगति को प्राप्त हो गए जिससे मराठों की सेना का मनोबल टूट गया और अब्दाली की सेना में नया जोश आ गया और वे उठ खड़े हुए और मराठों की हार का कारण बने। इस युद्ध में करीबन 40,000 योद्धा मारे गए जो एक सामान्य युद्ध से कहीं ज्यादा था ।

सदियों से भारत के विनाश का कारण आपसी झगड़े, ईर्ष्या और लालच रहे है तथा राजाओं और बादशाहों ने अपने-अपने स्वार्थ के लालच में बाहरी दुश्मनों को पनाह दी जिस कारण बाहरी दुश्मनों को इसका फायदा मिला और सोने की चिड़िया कहे जाने वाला भारतवर्ष को बाहरी दुश्मन लूटते रहे फिर वह मुगल, अफ़ग़ान, पुर्तग़ाली, डच, फ्रेंच या फिर अंग्रेज हो । इस बीच अगर सभी एकजुट होकर लड़ते तो शायद आज हमारा भारतवर्ष सबसे शक्तिशाली देश होता । आज भी हमारा भारत देश राजनीति के चलते कई भागों में बँट चुका है जिसे जरूरत है तो सिर्फ एक साथ खड़े होने की ।

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Nawazuddin image

Nawazuddin Siddiqui

image of Nawazuddin siddiqui
source – http://nawazuddinsiddiqui.com/

Today I am going to tell you about Nawazuddin Siddiqui the person who did hard penance for 12 years, after which he started getting success in life.

People often say when bad time is going on life, keep your patience, hard time will definitely pass”

Friends, let’s know about Nawazuddin Siddiqui, how he struggled in life and made every effort to get closer to fulfil his dreams and finally reached that point where he wanted to be in his life.

About Nawazuddin Siddiqui

Nawazuddin Siddiqui was born on 19 May 1974, in Budhana, a small district of Muzaffar Nagar, Uttar Pradesh, he was the eldest of 8 brothers and sisters.

Nawazuddin Siddiqui married to Aaliya Anjali Siddique. They have been blessed with a daughter and a son named Shora and Yaani.

lets we go through the struggling Nawazuddin Siddiqui to the Bollywood’s best actor Nawazuddin Siddiqui

Nawazuddin Siddiqui Education

Studied in his village till the class twelfth, after that he left the village and moved to the city to explore new things, as he thinks that the people in his village only know three things, wheat, sugarcane and guns

Completed his graduation from Gurukul Kangri University, Haridwar, Uttarakhand in science

He worked in a petrochemical company in Vadodara, Gujarat as a chemist, but he did not enjoy his work, he thought that this work is not fit for him.

How Actor Nawaz Born?

One day Nawazuddin Siddiqui and his friend went to see a stage show. He was so impressed with that, he quit his job without giving a second thought and came to Delhi.

He started working as a watchman in a company located in Noida, he got himself enrolled in NATIONAL SCHOOL OF DRAMA ( NSD) New Delhi and graduated in 1996, meanwhile perusing his graduation from NSD he got associated with Sakshi Theatre Group for a year or so and worked with actors like Manoj Bajpai and Saurabh Shukla.

By that time Nawaz had realized that he had developed himself as a good artist, but he also knew that doing nukkad, and theatre would not fill his stomach, and it would be not easy to survive in city like Delhi, After which he set out to Mumbai in search of work and to fulfil his dream. And this is where the round of rejections started for Nawazuddin Siddiqui.

After coming to Mumbai, he started living with some friends of NSD, they were a group 10–12 people were living in a very small room.

Nawaz gave many auditions, but he was rejected every time due to his small height and dark color shade, but he didn’t give up.

By the time all his savings vanished and even he didn’t have the amount to pay his part of rent, the roomies ask Nawaz to find some other place as he was not paying rent for the room, Nawaz asked his friends as he couldn’t able to pay the rent but he can prepare food for everyone, his friend agreed for few days but later he was asked to leave from there.

After that he went to stay in another place, there too they kept him on the same condition that he would make their two-time meal, then Nawaz realized that he had not come to Mumbai to  become a cook, he came here to became an actor, when he told this thing to the owner of that house, then he told Nawaz if you cannot do all theses, then you cannot stay here. he tried hard to convince him, but still, he did not let him stay there.

Nawaz was going through a very shard life, full of struggles for hard 12 years in his life, At a point of time, after suffering so many rejections, his courage brakes for once he thought to go back to his village but he also realised, what he will do there?, Nawaz rejuvenates himself and again started his hard work as the word giving up was not in his dictionary, he never gave up, & he never let any kind of lack in his efforts.

He Changed his name from Nambardar Nawazuddin Siddique to simply Nawazuddin Siddique for his acting career.

Nawaz tried to get work in television serials but did not achieve much success in that, he remains unnoticed despite his strong performance.

In the Year 2003, he did a short film named The Bypass where he appeared with Irrfan Khan. Beyond that between 2002-05, he was largely out of work.

Then in 2007, he worked in Anurag Kashyap’s Black Friday paved way for other powerful roles.

He got his first lead role ( a role which ‘transformed his acting style’ ) in Prashant Bhargava’s PATANG, which premiered at the Berlin Film Festival, world-renown film critic Roger Ebert praised his performance. 

Then he also appears in cameo role in hit song “emotional attyachar”. He came to limelight with the movie Aamir Khan Productions’s Peepli Live (2010) where he acted as a journalist.

He also worked in may other films like Paan Singh Tomar, Kahaani (2012), Gangs of Wasseypur, Miss Lovely, Aatma

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